बाल कहानी – “ पहलवान की ठुल्ली ” – अरविन्द कुमार ‘साहू’

पहलवान की ठुल्ली

लघुकथा अरविंद कुमार साहू
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 सई नदी के किनारे बरगद का एक पुराना पेड़ था | उसके नीचे एक बूढ़े पहलवान का अखाड़ा था | जब पहलवान जवान हुआ करता था तो आसपास के सैकड़ों गाँवों मे उसकी तूती बोलती थी | हर एक पर उसका हुक्म चलता था | मजाल थी कि कोई उसकी बात टाल दे | उसके अनेक चेले अखाड़े मे दंड – बैठक लगाया करते थे | कुछ लट्ठ लेकर उसके साथ रहा करते थे | मेला जैसा लगा रहता था | पूरे इलाके मे उसकी दादागीरी चलती थी | पर एक बात जरूर थी कि पहलवान किसी का नुकसान कभी नहीं होने देता था | सबके साथ अपने ढंग से सहयोग और न्याय भी करता था | सो , लोग उसकी इज्जत भी करते थे | उसकी बातें भी मानते थे | 

लेकिन समय का चक्र देखिये | उसके बूढ़े हो जाने पर उसके अखाड़े मे वो रौनक नहीं रह गई | सारे चेले उसे छोडकर नए अखाड़ों मे चले गये | पहलवान अकेला पड़ गया | वहाँ सब कुछ उजाड़ सा लगने लगा | लेकिन न तो उसकी स्वाभाविक रंगबाजी गई , न उसका अच्छा स्वभाव गया | सो कुछ लोग उसकी खाने पीने मे मदद कर देते | कुछ लोग उसके छोटे मोटे जरूरी काम भी कर देते थे | वह अब भी कमोबेश पहले की तरह रहता , खाता – पीता , कुछ दंड बैठक मार लेता और सबसे बड़ी बात कि अब भी वह अपने तरीके से दूसरों की कुछ मदद करना भी न भूलता |  उसके पास अपने पुराने जमाने की सिर्फ एक ही निशानी बची थी | खूब लम्बी और सुंदर सी ठुल्ली | ये उसके जवानी के दिनों से ही सिर के बीचो - बीच शान के साथ लटकती – झूलती रहती थी | उसे अपनी इस ठुल्ली से बहुत प्यार था | वह उसे बहुत संभाल कर और सजा - संवार कर रखता था | 

एक दिन की बात | बरगद के नीचे उसके अखाड़े से होकर एक नाई गुजरा | - “बाल .... कटवा लो , चोटी ….. बनवा लो ....,” की पुकार लगाते हुए | पहलवान ने नाई से कहा – “ भाई ! मेरे भी बाल काट कर छोटे कर दो | बहुत ज्यादा बढ़ गये इन लंबे बालों मे मेरी प्यारी ठुल्ली मानो छुप सी गयी है | ठीक से दिखती नहीं , सो कुछ अच्छी भी नहीं लगती |”

“हाँ – हाँ क्यों नही , नीचे बैठ जाओ | अभी काट देता हूँ |” पहलवान आसन जमाकर बैठ गया तो नाई की कैंची भी कचर – कचर चलने लगी | .... और साथ मे नाई की जबान भी | दरअसल वह बड़ा बातूनी था | बालों की कटाई के साथ ही पहलवान के पुराने दिनों की बातें करते हुए उसे खुश करता जा रहा था | दोनों मगन थे | थोड़ी देर बाद काम पूरा करके नाई बोला – “लो भाई , तुमको फिर से पुराना वाला पहलवान बना दिया |” 

पहलवान बड़ा खुश हुआ | वह सई नदी के जल मे झाँक कर अपना सुंदर हो चुका चेहरा देखने लगा | किन्तु देखते ही हड्बड़ा गया | “यह क्या ? मेरी ठुल्ली कहाँ गयी ? तुमने मेरी ठुल्ली भी काट दी ? हे भगवान ! तुम्हें मुझसे कौन सी दुश्मनी थी ?”- पहलवान रूआँसा हो गया | नाई हक्का – बक्का सा बोला  - “पहलवान भाई ! मुझे माफ कर दो | गलती हो गई | तुमसे बातें करते हुए मुझे इसका पता ही नहीं चला |” लेकिन पहलवान को ज़िंदगी मे पहली बार इस नाई पर जबरदस्त गुस्सा आ गया था | नाई ने उसकी जिंदगी की सबसे प्रिय वस्तु जो छीन ली थी | वह गुस्से मे बोला – “ मैं तुझे इस गलती के लिए माफ नहीं कर सकता नाई ! तूने मेरा दिल दुखा दिया है | मैं इस अखाड़े मे अपनी ठुल्ली के बिना नहीं रह सकता |….. और तुझे भी कुछ सजा भुगतनी ही पड़ेगी |” 

गुस्से से भरे पहलवान ने उसकी कैंची छीन ली | नाई ने हड़बड़ाकर पूछा – “ तुमने मेरी कैंची क्यों छीन लिया ?” पहलवान बोला – “ तूने इसी कैंची से मेरी प्यारी ठुल्ली काट डाला न ? ये तेरा आदेश तो मानती नहीं | सो तेरे किस काम की ? तूने मेरी ठुल्ली लिया , मैंने तेरी कैंची लिया |” नाई चुप रह गया | पहलवान गुस्से मे अखाड़े से बाहर निकला और पैर पटकते हुए एक  ओर को चल दिया | 

वास्तव मे नाई को भी पहलवान की ठुल्ली कट जाने से बड़ा दुख पहुंचा था | लेकिन अब वह कर भी क्या सकता था ? आखिर , गलती हो गई तो हो गई | उसे पहलवान के इस तरह से अखाड़ा छोड़ कर जाने का भारी पश्चाताप हुआ | वह सोचने लगा – “ऐसा क्या करे कि बेचारा पहलवान वापस आ जाय” | तब उसे पुरखों की कही एक बात याद आई | पुरखे कहा करते थे कि यदि कोई प्रिय व्यक्ति अचानक घर छोड़ कर जाने लगे तो किसी प्रकार उसकी चोटी या कुछ कटे हुए बाल प्राप्त करके जमीन मे गाड़ देना चाहिए | इससे भागा हुआ वह व्यक्ति जल्द ही अपनी जगह वापस लौट आता है | बस , फिर क्या था ? नाई ने पहलवान की कटी हुई चोटी ढूँढ निकाली और बरगद के नीचे अखाड़े मे ही गाड़ दिया | फिर इसका परिणाम देखने के लिए उत्सुकता पूर्वक पहलवान के पीछे – पीछे छुपते – छुपाते दौड़ चला | सोच रहा था – “देखें , गुस्साया हुआ पहलवान आगे कौन सा गुल खिलाता है ?”

     इधर नाराज पहलवान चलता चला जा रहा था | कुछ दूर जाने पर उसे एक गड़रिया मिला | वह कम्बल बनाने के लिए अपनी भेड़ के बाल नोच – नोच कर उखाड़ रहा था | भेड़ दर्द के मारे ज़ोर – ज़ोर से चिल्ला रही थी – “ मेंsssss मेंssssss” | पहलवान को भेड़ पर बड़ी दया आयी और गड़रिये पर गुस्सा भी | पूछा – “ इसके बाल ठीक से नहीं काट सकते | ये क्या तरीका है ?”

गड़रिया बोला – “ मेरे पास कैंची नहीं है | इसलिए ऐसा कर रहा हूँ |” फिर गड़रिये ने उसके हाथ मे कैंची देखी तो खुशी से कहने लगा – “ये अपनी वाली कैंची मुझे दे दो न | आखिर तुम इसका करोगे ही क्या ?”

“ हूँ ...” , पहलवान कुछ सोचता हुआ बोला –“ चल ले ले |” उसने खुशी – खुशी वह कैंची गड़रिये को दे दी | जब गड़रिया उसकी कैंची लेकर भेड़ के बाल आराम से काटने लगा तो पहलवान उसका कंबल उठाकर चल दिया |

पीछे दौड़ता हुआ गड़रिया घबराकर बोला – “ अरे... अरे पहलवान , यह क्या कर रहा है ?”

 पहलवान पलटकर बोला – “ मेरी ठुल्ली नाई लिया , नाई की कैंची मैं लिया | मेरी कैंची गड़रिया लिया तो गड़रिया का कंबल मैं लिया | वैसे भी तू जिस भेड़ के बाल का कम्बल बनाकर खूब कमाता है , उसी भेड़ को बहुत कष्ट देता है | अब कैंची के बदले मे ये सामान तो कुछ भी नहीं |”  

“ ओह .... |” - गड़रिया अपना सा मुँह लेकर चुप रह गया | पहलवान आगे चल दिया |

थोडी दूर और जाने पर एक किसान मिला | वो ठंड मे काँपते हुए बैलों को मार – मार कर हांक रहा था | पहलवान ने गुस्से से पूछा – “ अरे भाई , इन बैलों को इतना मार क्यों रहा है ?”

किसान चिढ़ कर बोला – “ दिखता नहीं ,मैं ठंड से अकड़ा जा रहा हूँ और ये ठीक से चलते भी नहीं |”

पहलवान थोड़ी देर तक सोचता रहा | फिर बोला - “ अच्छा ये बात है | ये ले….., तू यह कंबल ले जा , तेरा जाड़ा छूट जाएगा | पहलवान ने कंबल किसान की ओर बढ़ाया तो उसने खुशी से ओढ़ लिया और फिर अपने बैल हाँकने की कोशिश करने लगा | अबकी बार पहलवान ने उसका एक बैल पकड़ा और स्वयं उसे हाँकते हुए एक ओर को चल दिया | किसान हड्बड़ा कर बोला – “ अरे...रे... यह क्या कर रहे हो ? मेरा एक बैल क्यों ले लिया ?”

 पहलवान बोला – “ बदलौना ...... | मेरी ठुल्ली नाई लिया , नाई की कैंची मैं लिया | मेरी कैंची गड़रिया लिया तो गड़रिया का कंबल मैं लिया | मेरा कंबल तू लिया तो तेरा बैल मैं लिया | वैसे भी तेरी ठंड दूर करने के बदले एक बैल कुछ ज्यादा नहीं है |” किसान चुप हो गया , उसके बोल न फूटे और पहलवान फिर आगे बढ़ गया |

थोड़ी दूर और आगे जाने पर एक तेली मिला | वो कोल्हू चलाकर सरसों का तेल निकाल रहा था | लेकिन पहलवान यह देखकर दंग रह गया कि वह तेली कोल्हू के चक्के को बैल की जगह अपनी औरत से खिंचवा रहा था | बेचारी थकी हुई औरत पसीने से लथपथ थी | पहलवान को उस औरत पर बड़ी दया आयी | उसने तेली को डांटते हुए कहा  – “ यह क्या तरीका है ? औरत से जानवर की तरह काम लेते हो |” तेली बोला – “ मेरे पास बैल नहीं है , क्या करूँ ?”

 पहलवान सोचता हुआ बोला – “ पर ये तरीका भी बिलकुल ठीक नहीं है | अच्छा ये लेजा | मेरा बैल जोत कर कोल्हू चला ले |” तेली खुशी – खुशी बैल को कोल्हू मे जोतने लगा तो पहलवान उस की औरत को अपने साथ लेकर चल दिया | तेली चिल्लाया – अरे ....अरे , मेरी औरत को क्यों ले जा रहे हो ?”

 पहलवान बोला – “ मेरी ठुल्ली नाई लिया , नाई की कैंची मैं लिया | मेरी कैंची गड़रिया लिया तो गड़रिया का कंबल मैं लिया | मेरा कम्बल किसान लिया तो किसान का बैल मैं लिया | मेरा बैल तूने लिया तो तेरी औरत मैं लिया | वैसे भी इसके साथ बैल जैसा व्यवहार करने वाला इसके लायक तो नहीं हो सकता |”

तेली की बोलती बंद | उस को जवाब न सूझा तो पहलवान फिर आगे बढ़ गया | 

काफी दूर आगे जाने पर पहलवान को इस बार एक ब्राह्मण मिला | वो अपने हाथ से रोटियाँ सेंक रहा था | बार – बार उसकी उंगलिया आग से जल जाती थी | पहलवान बोला – “ अरे.... रे... पंडित जी ! इस तरह खुद को क्यों जला रहे हो ?”

ब्राह्मण बोला – “...... और क्या करूँ ? मेरे पास कोई औरत नहीं है | मुझे रोटियाँ भी ठीक से सेंकनी नहीं आती |”

 पहलवान सहानुभूति पूर्वक बोला – “ अच्छा ...! कोई बात नहीं | चल ये औरत अपने साथ रख ले | तेरा खाना भी बना देगी और तेरी पूजा की जगह भी साफ रखेगी |”

“अरे वाह ! भगवान आपका भला करे |” पहलवान का इशारा पाकर औरत तुरंत आगे बढ़ी | हाथ – पैर – मुँह धोकर ब्राह्मण का खाना बनाने लगी | ब्राह्मण बहुत खुश हुआ | पहलवान को सुखी होने का आशीर्वाद देकर अपना शंख बजाते हुए खुशी जाहिर करने लगा | चारों ओर धुत्तू .....धूँ …… , धुत्तू .... धूँ ...... की अद्भुत आवाज गूंजने लगी | शंख की इस आवाज से पहलवान को बड़ा मजा आया | अब तो पहलवान ने ब्राह्मण का शंख ही माँग लिया और मटकता हुआ आगे बढ़ गया | 

“ अरे भाई , मेरा शंख क्यों ले लिया ?” – ब्राह्मण पूछता हुआ पीछे – पीछे दौड़ा |

पहलवान जाते हुए बोला – “ मेरी ठुल्ली नाई लिया , नाई की कैंची मैं लिया | मेरी कैंची गड़रिया लिया तो गड़रिया का कंबल मैं लिया | मेरा कम्बल किसान लिया तो किसान का बैल मैं लिया | मेरा बैल तेली लिया तो तेली की औरत मैं लिया | इस औरत को तुझे दिया तो तेरी मामूली शंख मैं लिया | क्या कुछ ज्यादा गलत किया ?” ब्राह्मण मन मारकर बोला – “ जा भाई जा , कोई बात नहीं |” 

 अब तक शाम हो गयी थी | अंधेरा घिरने लगा था | पहलवान भी सारे दिन की भागदौड़ मे थक चुका था | अब तक उसका गुस्सा भी काफी ठंडा हो गया था | वाह सोच रहा था – “ चलो ठुल्ली गयी तो गयी , लेकिन इसी बहाने कई लोगों की मदद हो गयी |” 

फिर पता नहीं क्यों ? उसे अपने अखाड़े की याद भी सताने लगी | उसका मन बेचैन हो उठा | सोचने लगा कि अखाड़े मे वापस लौट जाना चाहिए या नहीं ? वह विचार कर ही रहा था कि तभी सामने से कुछ लोग घबराए हुए आते दिखे | पहलवान ने उनको रोक कर पूछा  – “ क्या बात है ? ऐसे डरे हुए क्यों हो ?  

लोगों ने बताया – “ सई नदी के किनारे बरगद के नीचे पहलवान के खाली पड़े अखाड़े मे कुछ डाकू आ गए हैं  | वो लोग उधर से कमा कर लौटने वाले राहगीरों को मार – पीट कर उनका समान छीन ले रहे है | काश ! वहाँ पुराने पहलवान जी होते तो किसी की औकात न होती ऐसा करने की | बेचारे पहलवान जी ! पता नहीं कहाँ चले गये ? कुछ भी हो भाई , बड़े भले आदमी थे वे |” कहते हुए लोग आगे बढ़ गये | शायद शाम के धुंधलके मे और दाढ़ी बाल कट जाने के कारण उन लोगो ने पहलवान को पहचाना ही नहीं |

अब तो पहलवान मानो गहरी नींद से जागा | उसकी आँखें खुल गई थी | शंका के सारे बादल छंट गये | आँखों से पश्चाताप के आँसू बरसने लगे | उसे बहुत खेद हुआ कि जिस इलाके के लोग उसे इतना प्यार करते हैं वह उन्हीं लोगो को सिर्फ एक ठुल्ली कट जाने की वजह से छोड़ कर भागा जा रहा था | ये तो बहुत गलत बात है | वह जल्द ही एक निर्णय पर पहुँच गया कि उसे वापस जाना ही चाहिए | उसका पहलवानी वाला पुराना जोश फिर से जाग उठा |   

“ उन डाकुओं की ये मजाल ? मेरे अखाड़े के पास दुष्टों की इतनी रंगबाजी , गुंडा गर्दी , डाकाजनी ... ? थू ... धिक्कार है मुझ पर | मुझे तो शर्म के मारे चुल्लू भर पानी मे डूब मरना चाहिए | अब मैं लौट रहा हूँ | अपने जीते जी ऐसा कत्तई नहीं होने दूँगा |” -  पहलवान को एक बार फिर गुस्सा आ गया था | वह भी बड़े ज़ोरों का | वह गुस्से मे तूफान की तरह बरगद के पेड़ की ओर दौड़ा | दौड़ता गया | इतना तेज कि देखते ही देखते वापस अपने अखाड़े तक मानो उड़ कर पहुँच गया | जवानी के दिनों की तरह कूद - फांद कर एक झटके मे बरगद के पेड़ की चोटी पर चढ़ गया | फिर ब्राह्मण से लिए हुए शंख को बड़े ज़ोर – ज़ोर से , भयानक आवाज मे चीख- चीख कर बजाने लगा | अचानक मची इस दहशत से डाकू दल मे घबराहट फैल गयी | किसी ने कहा – “ भागो , लगता है बरगद के पेड़ पर सोया हुआ कोई भूत जाग गया है | सब लोग जल्दी भागो , वरना वह हम सबको मार डालेगा |” 

“ हाँ भागो भागो ....., | डाकुओं मे किसी अनजाने भय के कारण सचमुच भगदड़ मच गयी | अंधेरे मे कई डाकुओं को कोई रास्ता न सूझा तो वे सई नदी मे कूद पड़े | नदी मे तेज बाढ़ आयी हुई थी | अनेक डाकू तेज धारा मे बह गए या डूब कर मर गए | बाकी सिर पर पाँव रखकर जान बचाने के लिए भाग निकले |

अब उस पूरे इलाके से डाकुओं का आतंक हमेशा के लिए समाप्त हो गया था | पहलवान बड़ा खुश हुआ | चलो , आज तो कई अच्छे काम हो गए | अब उसे अपनी ठुल्ली कट जाने का बिल्कुल भी दुख नहीं था | वह फिर से अखाड़े मे रहने लगा | धीरे – धीरे फिर उसके सिर के बीचो बीच उगी उसकी प्यारी सी ठुल्ली बढ़ते – बढ़ते अपने पुराने रूप मे आ गई | पहलवान का यह दुख एकदम से जाता रहा | सारी बातों का गवाह नाई ये किस्सा सारे गाँव को सुनाने लगा | बहुत दिनो तक सुनाता रहा | ..... और हाँ , वह यह भी जरूर बताता था कि उस पहलवान की कटी हुई ठुल्ली आज भी उसी बरगद के नीचे गड़ी हुई है | ...... और वह पहलवान उसी ठुल्ली की वजह से ही वहाँ वापस लौट कर आया था |





अमेज़न .कॉम पर उपलब्ध अरविन्द कुमार साहू जी की पुस्तकें



किस्सा ढपोरशंख का : (बाल कहानी संग्रह) 

नीम भवानी : नीम वृक्ष पर आधारित प्रबन्ध काव्य

ठेलुहे   की शादी 


अजब अनोखी पद्य कथाएँ


डॉक्टर प्रेत: भुतही कहानियाँ 

कवि बौड़म डकैतों के चंगुल में: हास्य उपन्यास


खुद क्यों नहीं नहाते बादल : 38 बाल कवितायें (Hindi Edition)


लौट आओ गौरेया 


साहित्यकार परिचय - अरविन्द कुमार ‘साहू’

जन्मतिथि: 15-10-1969 (पन्द्रह अक्टूबर उन्नीस सौ उनहत्तर ई.)   
 जन्म स्थान: रायबरेली, उत्तर प्रदेश, भारत
प्रकाशित साहित्य : नीम भवानी (प्रबन्ध काव्य), विश्रान्ति (उपन्यास), कवि बौड़म डकैतों के चंगुल में (हास्य उपन्यास), परियों का पेड़ (बाल उपन्यास) किस्सा ढपोरशंख का, लौट आओ गौरैया (बाल कहानी संग्रह),                                             *ईबुक कवि बौड़म और समझदार गधा (हास्य उपन्यास) कवि बौड़म के कारनामे (संयुक्त उपन्यास), खुद क्यों नहीं नहाते बादल (बाल कविता संग्रह), डॉक्टर प्रेत (भुतही कहानियों का संग्रह) लेजर मैन का आतंक (मनोरंजक कहानी संग्रह), अजब अनोखी पद्य कथाएँ (कविताओं में कहानियाँ), कुछ बूझें कुछ ज्ञान बढ़ाएँ (बच्चों के लिए पहेलियाँ) |                                                     *शीघ्र प्रकाश्य (पांडुलिपियाँ)- जंगल में फटफटिया, सॉरी छुटकी,  स्मार्ट फोन (बाल कहानी संग्रह) कवि बौड़म की हास्य कथाएँ (संग्रह) पत्थर पर उगी दूब (कविता गीत संग्रह ) गजल एकादश (गजल संग्रह )THE TREE OF ANGELES (child fiction, परियों का पेड़ का अँग्रेजी अनुवाद)                                                                                                                                                                     पूर्व में प्राप्त पुरस्कारों/सम्मानों का विवरण : *साहित्यश्री, *भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) का प्रेमचंद जयन्ती सम्मान, *श्री जगदीश दुग्गड़ स्मृति राष्ट्रीय बाल साहित्य सम्मान एवं पुरस्कार 2016 *नेपाल-भारत मैत्री फाउंडेशन विशिष्ट प्रतिभा सम्मान 2017, *पं. रामानुज त्रिपाठी बाल साहित्य सम्मान 2018, *आर्य लेखक परिषद दिल्ली द्वारा साहित्य प्रज्ञा सम्मान *बाल साहित्य संस्थान कानपुर द्वारा प्रदत्त किशोर सम्मान व पुरस्कार 2019,*हम सब साथ साथ संस्था द्वारा विशिष्ट प्रतिभा सम्मान 2019 |                                                            अन्य साहित्यिक उपलब्धियाँ : पिछले 33 वर्षों से उपन्यास, कहानी, कविता, गजल, लेख आदि विभिन्न विधाओं में लेखन | बाल साहित्य में विशेष रुचि | नंदन, चंपक, बालभारती, पराग, नन्हें सम्राट, बालहंस, बालवाणी, बाल किलकारी, अपूर्व उड़ान, बाल वाटिका, बाल भास्कर, बच्चों का देश, बालभूमि, अच्छे भैया, दोस्त, कादंबिनी, नवनीत, आजकल, सूरज समाचार विचार, निर्भय पथिक, जनसत्ता, दैनिक जागरण, ट्रिब्यून, बालरंग आदि देश - विदेश की प्रमुख पत्र - पत्रिकाओं में 500 से अधिक रचनाएँ प्रकाशित |                                                               *अनेक कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ एवं विभिन्न साहित्यिक कार्यक्रमों व बाल साहित्य की रचनात्मक कार्यशालाओं, प्रशिक्षण सत्रों में भागीदारी, प्रतियोगिताओं के निर्णायक मण्डल सदस्य  | राष्ट्रीय सहारा (दैनिक समाचार पत्र) में संवाददाता रहे |*अखिल भारतीय विचार लेखन प्रतियोगिता में प्रथम स्थान|       

*सम्पादन अनुभव – अपूर्व उड़ान (बाल मासिक), जागरण जंक्शन में कार्यकारी संपादक रहे | मधुर सरस मासिक, सारा समय न्यूज एवं सुपर इंडिया साप्ताहिक में साहित्य संपादक तथा सूरज पॉकेट बुक्स एवं जयविजय (ई पत्रिका) मे सह संपादक रहे |                                                                                      सम्पर्क सूत्र (दूरभाष सहित) : साहू सदन, अकोढ़िया रोड, ऊँचाहार - रायबरेली (उप्र) पिन– 229404 मोबाइल : 7007190413 / 9838833434 ईमेल: aksahu2008@rediffmail.com     




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