भूत वाली हवेली: अरविन्द कुमार साहू


अरविंद कुमार साहू
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 गाँव के उत्तर में एक विशाल हवेली थी | इतनी बड़ी हवेली थी कि जैसे कोई महल हो | उसके चारों ओर ऊँची – ऊँची दीवाल बनी हुई थी | इतनी ऊँची दीवाल कि कोई बच्चा तो क्या ? बड़ा भी फांद कर अंदर न जा सके | उसमें गाँव की ओर एक बड़ा सा लोहे का फाटक लगा हुआ था | इतना बड़ा फाटक कि कई बैलगाडियाँ एक साथ निकल जायें | लेकिन उस फाटक पर बड़ा सन्नाटा रहता था | इतना बड़ा सन्नाटा कि जैसे वहाँ भूतों का डेरा हो | 

सच में.... लोग उस हवेली को भूत वाली हवेली ही कहते थे | 

     दहशत इतनी थी कि कोई बच्चा दिन में भी उस हवेली के आस पास नहीं फटकता था | सब डरते थे | इतना डरते थे कि रात में उस हवेली का नाम तक नहीं लेते थे | माँ – बाप कहते कि जो उस हवेली नाम ले लेता है, उसको भूत खा जाता है | अब तक कई लोगों को हवेली का भूत खा चुका है | यह अफवाह इतनी थी कि भूत ने जिन लोगों को खा डाला था, गाँव मे उनका नाम – पता भी बताने वाला अब कोई जीवित नहीं बचा था |

      नौ साल की एंजेल शहर के कान्वेंट स्कूल में पढ़ती थी | इस बार गर्मी की छुट्टी उसने गाँव में बिताने का निश्चय किया था | भूत वाली हवेली के इसी गाँव मे उसकी ननिहाल थी | उसने जब से होश संभाला था, वह किसी गाँव मे नहीं गई थी | उसे गाँव का रहन सहन देखने की बड़ी उत्सुकता थी | उसके ननिहाल में उसका जमकर स्वागत सत्कार हुआ | एंजेल जल्द ही वहाँ के बच्चों के साथ घुल मिल गई |

      कई दिन तक उसने गाँव के बच्चों के साथ उनके ही खेल सीखे और खेले | उसे खूब मजा आ रहा था | यहाँ के बच्चों के खेलों मे गंवई कविताएं भी होती थी, जिन्हे रटने में बड़ा मजा आता था | जैसे – “आला – गूला, माटी का चूल्हा | गिरी कड़ाही, फूटा चूल्हा |’ .... और “राजा गए दिल्ली, दिल्ली से लाये चार बिल्ली | एक बिल्ली कानी, एंजेल की नानी |” 

      एंजेल की तरह किसी भी बच्चे का नाम उसको चिढ़ाने के लिए जोड़ दिया जाता था | सच मे एंजेल को इस नए परिवेश मे खूब मजा आया था  | उसने सभी खेलों का भरपूर आनंद लिया |

        एक दिन बच्चों में गिल्ली – डंडा का खेल हुआ | एंजेल को यह देख कर बड़ा मजा आया कि यह बिलकुल देहाती क्रिकेट जैसा था | एक बैट जैसे डंडे से बाल जैसी गिल्ली को ज़ोर से मारकर खूब दूर फेंका जाता था | गिल्ली को चारों ओर खड़े बच्चे कैच की तरह लपकने की कोशिश करते थे | जिसके हाथ से कैच छूट जाता था, वह काफी दूर चली गई गिल्ली को दौड़ते हुए ढूंढ कर वापस लाता था | 

       इस बीच बैट जैसे डंडे वाला लड़का एक निश्चित दूरी तक दौड़ लगा कर अपना घर अर्थात विकेट बचाने की कोशिश करता और गिल्ली लाने वाला लड़का उसकी गैर मौजूदगी मे उसके घर से गिल्ली को टच कराकर उसे आउट करने की कोशिश करता | 

       सब कुछ हूबहू क्रिकेट जैसा था | नई खिलाड़ी एंजेल को भी इसमे खूब दौड़ लगानी पड़ी | वह बड़ी मुश्किल से साथी खिलाड़ी को आउट करके बैटिंग करने अर्थात गिल्ली उड़ाने का मौका पा सकी थी | सो अपनी पारी आते ही एंजेल ने भी चौका - छक्का स्टाइल मे गिल्ली उड़ाना शुरू कर दिया | वह अपने स्कूल में क्रिकेट की अच्छी खिलाड़ी थी | उसको खूब छकाने वाले प्रतिद्वंदी खिलाड़ी को भी जमकर छकाने के लिए एंजेल ने इतनी जोरदार शॉट मारी कि गिल्ली उड़ते हुए करीब सौ फीट दूर की बाउन्ड्री वाल को पार करके हवेली में जा गिरी | इससे वहाँ के बच्चों मे हड़कंप मच गया | 

- “अरे, गिल्ली तो भूत वाली हवेली में चली गई | हाय ! अब क्या होगा ?” 

      सभी बच्चे भय के मारे एक ओर सिमट कर खड़े गए | थोड़ी देर पहले खुशी से चहकते हुए बच्चों का मजा किरकिरा हो चुका था | जिस बच्चे का गिल्ली – डंडा था, वह एंजेल से उलझ गया – “तुमने मेरी गिल्ली को इतनी ज़ोर से हवेली की तरफ क्यों मारा ?”

एंजेल ने भौचक होते हुए कहा – “तो ? आखिर हुआ क्या ? मैं अभी बाउन्ड्री के पार से तुम्हारी गिल्ली लाकर दे देती हूँ |” 

वह लपक कर हवेली की ओर बढ़ी तो सारे बच्चो ने उसे रोक लिया और हवेली के भूत की कहानियाँ सुनाते हुए कहा – “वहाँ मत जाओ, वरना भूत तुम्हें भी खा जाएगा |”

     एंजेल को बड़ा आश्चर्य हुआ कि गाँव के बच्चे अभी भी भूत प्रेत के नाम पर डरते हैं | उसने सब को समझने की कोशिश किया – “अरे, ये भूत प्रेत जैसा कुछ भी नहीं होता | चलो मैं अभी हवेली से गिल्ली लेकर आती हूँ |” 

लेकिन उसकी बात कोई बच्चा नहीं माना, तो धुन की पक्की एंजेल अकेले ही हवेली के गेट की ओर चल पड़ी | अब तो डर के मारे कुछ बच्चे उसे रोकने की कोशिश करते हुए उसके पीछे भागे | बाकी बच्चे घर वालों को बताने के लिए गाँव की ओर भाग निकले | 

      फाटक के पास पहुँचकर एंजेल ने लोहे के सींखचों से अंदर झाँककर देखा | उसे भूत या आदमी जैसा कोई भी नहीं दिखा | वहाँ दोपहर का सन्नाटा छाया था | अंदर पेड़ों मे पके हुए आम लगे थे, जिनकी खुशबू बाहर तक आ रही रही थी | थोड़ी ताक झांक से गिल्ली बाउन्ड्री वाल के अंदर पड़ी दिखाई दे गई | 

       निर्भीक एंजेल हवेली के भीतर घुसने का कोई और रास्ता न देख, सींखचों के सहारे फाटक पर चढ़ कर अंदर की ओर उतर गई | बाहर कुछ डरे सहमे बच्चे हिलते, काँपते, डर से थरथराते हुए देखते ही रह गए | एंजेल सीधे गिल्ली के पास पहुंची और उसे उठाकर वापस लौटने लगी | 

       तभी एक ज़ोर की खरखराती और मरियल सी आवाज ने उसे धमकाते हुए रुकने की चेतावनी दी – “खबरदार ! रुक जाओ | कौन है वहाँ ?”  

एंजेल ठिठक कर अपनी जगह रुक गई | सोचने लगी – “भला यह कौन हो सकता है ? कहीं सचमुच कोई भूत प्रेत तो नहीं है ?” लेकिन फिर अपने मन से भय निकालते हुए साहस पूर्वक बोली - “मैं हूँ एंजेल, किसने पुकारा मुझे ?”

- “मैं हूँ इस हवेली का मालिक | यहाँ क्या करने आई हो ?” 

“मुझसे एक बच्चे की गिल्ली उछलकर यहाँ आ गिरी थी | वह इसके लिए नाराज हो रहा था | इस लिए मुझे लेने आना पड़ा |” – एंजेल ने अपना डर दबाते हुए कहा |

- “लेकिन तुम्हें मुझसे डर नहीं लगा ?” 

     आवाज अब पास आती जा रही थी | अब तो किसी अनजाने भय से एंजेल की साँसे भी धौंकनी की तरह चलने लगी थी | फिर भी वह हिम्मत करते हुए बोली – “ किससे और कैसा डर ?” 

अब आवाज एकदम पास आ गई थी - “भूत से और किसका डर है यहाँ ?” 

अबकी आवाज एंजेल के ठीक पीछे से आई थी | सतर्क एंजेल उसको देखने के लिए एकदम से पीछे पलट गई | चौंक कर बोली – “कौन है भूत ? कहाँ है भूत ?”

      फिर वह अचानक ही ठहाका मार कर हँसने लगी | सामने खड़े व्यक्ति को देखकर उसकी हँसी रुक ही नहीं रही थी | वह एक साँवले रंग का बूढ़ा व्यक्ति था, उसकी कमर झुकी हुई थी, सिर और दाढ़ी के बाल बेतरतीब बढ़े हुए थे | चेहरे पर चेचक के दाग थे | एक हाथ से उसने लाठी टेक रखा था और दूसरे हाथ में कुछ आम के फल लिए हुए था | 

   कोई गाँव का बच्चा होता तो शायद डर कर बेहोश ही हो जाता | किन्तु साहसी एंजेल बिलकुल भी न डरी – हाहा हाहा, तुम्हारे जैसे तो मेरे शहर में कई भिखारी घूमते रहते हैं | मेरी टीचर ने बताया है कि भूत प्रेत कुछ नहीं होते | तुम भी सिर्फ एक बूढ़े आदमी ही हो | तुमसे क्यों डरूँ ?”

“ओह ! तुम इस गाँव की नहीं हो | तभी तो मैं सोचूँ कि किसकी हिम्मत पड़ गई यहाँ घुसने की ? तुम शहर से आयी हो | अच्छे स्कूल में पढ़ती हो | साहसी लड़की हो | डरो नहीं बेटी ! मेरी बात सुनो | मैं सचमुच कोई भूत नहीं, सिर्फ इंसान ही हूँ | मुझे तो जबर्दस्ती का भूत इन गाँव वालों ने बना रखा है |

     इतना सुनते ही एंजेल भी एकदम सामान्य हो चुकी थी | उसे इस बूढ़े से सहानुभूति होने लगी | उसने प्यार से पूछा – “लेकिन दादाजी ! सब आपको भूत क्यों समझते है ?” 

     प्यार के दो बोल सुनते ही बूढ़ा पिघल गया | उसकी आँखों से दर्द के आँसू बहने लगे – “इतनी बड़ी हवेली मे अकेला रहने वाला किसी भूत से कम क्या होगा ? ये सब मेरे ही कर्मों का फल है | पहले मैं यहाँ का जमींदार हुआ करता था |” 

– “अच्छा ? फिर ये स्थिति कैसे आ गयी ?”

- “आओ ! इधर आराम से बैठो ,सब बताता हूँ |”

      बूढ़ा पास के एक चबूतरे पर बैठ गया | एंजेल को कुछ आम के फल देता हुआ बोला – “ये फल बीनने के लिए इधर से निकला था | लो तुम भी खाओ बेटी | तब तक मैं आराम से तुम्हें सारी बात समझाता हूँ |” 

      एंजेल बिना झिझक चबूतरे पर बैठ कर एक आम खाने लगी | बूढ़े को बहुत दिनों बाद कोई हमदर्द मिला था | उसे एंजेल से बातें करके बड़ा अच्छा लग रहा था | सो उसने बताना शुरू किया – “पहले यह हवेली धन – दौलत की चमक से जगमगाया करती थी | पुरखों की तरह मैं भी यहाँ के लोगों से कर वसूलने के लिए उन पर अत्याचार करता था | इसीलिए यहाँ के लोग मुझसे भी नफरत करते थे | लेकिन धीरे - धीरे समय बदला |’

 जमींदारी छिन जाने के बाद मेरे अधिकार खत्म हो गये | आमदनी बन्द हो गई | बस ये हवेली और इसकी बाग ही रह गई | मेरे परिवार के लोग विदेशों में जाकर बस गए | वेतन न मिलने के कारण यहाँ के नौकर - चाकर भी भाग गये | सिर्फ मैं अपनी हवेली के मोह में अकेला पड़ा रह गया |” 

“ओह... ! ” - एंजेल मंत्रमुग्ध सी सुनती रही | 

       बूढ़ा बताता रहा - “उम्र घटने पर बेसहारा और लाचार होते ही मुझे अपनी स्थिति का अहसास हुआ | मैंने पश्चाताप करते हुए अपने को बदल भी लिया | किन्तु अब तक बहुत देर हो चुकी थी | मेरे पिछले कर्मों का दंड देने के लिए लोगो ने मुझसे नफरत पाल रखी थी | कोई गाँव वाला मेरी मदद को नहीं आता | बच्चे भी इस तरफ न आयें, इसलिए भूत की अफवाह फैला दिया |” 

       “बेटी ! अब अंतिम पड़ाव पर ये जिंदगी काटे नहीं कटती | मैं अपने पापों का प्रायश्चित भी करना चाहता हूँ | लेकिन कोई मुझसे मिलना तक नहीं चाहता | बस यहीं पड़ा रहता हूँ | बाग में पेड़ो से गिरे फल खाकर भूख मिटा लेता हूँ | मैं चाहता हूँ कि यह हवेली और बाग किसी उचित व्यक्ति को दे दूँ तो शान्ति से प्राण निकले | किन्तु गाँव वाले मुझे पापी समझ कर मेरा मुख भी नहीं देखना चाहते |”

एंजेल ने उसकी बातें सुनकर एक गहरी सांस खींची और समझदार बच्चे की तरह बोली – “दादा जी, आप चिंता न करें | प्रायश्चित तो डाकू को भी बाल्मीकि जैसा संत बना देता है | मैं आपके लिये कुछ कोशिश जरूर करूंगी |”

     तभी बाहर शोरगुल सुनकर एंजेल चौंक उठी | उसने देखा, उसके अब तक न लौटने से किसी अनहोनी की आशंका में गाँव से दर्जनों लोग लाठी - डंडे लेकर हवेली के फाटक के पास जमा हो चुके थे और एंजेल को पुकार रहे थे | उनके साथ मे एंजेल की मम्मी और मामा भी थे | सभी बड़े गुस्से में थे और चिल्लाकर – चिल्लाकर एंजेल को छोडने के लिए हवेली के भूत को ललकार रहे थे | 

      यह सब देखकर बूढ़ा और घबरा गया | लेकिन एंजेल ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा – “आप परेशान न हो, मैं इन्हे देखती हूँ | मैं सब संभाल लूँगी |”

     एंजेल फुर्ती से चलकर हँसते हुए हवेली के फाटक पर आ पहुंची | कहने लगी  - “आओ मामा जी ! सभी लोग ताजे आम खाओ |”

 उसे हँसते हुए और सही सलामत देख गाँव वालों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा | एंजेल ने कहा – “चिंता मत करो, अब यहाँ कोई भूत नहीं है | सिर्फ एक बूढ़ा आदमी रहता है |” 

      एंजेल ने फाटक के भीतर से ही जमींदार के प्रायश्चित की सारी बात कह सुनाई | तब तक बूढ़ा जमींदार भी हाथ जोड़े हुए वहाँ आया और बड़ी सी चाभी लगाकर फाटक को खोल दिया | सारे लोगो को प्रेम से भीतर बुलाया और खाँसते हुए पूर्व में हुए दुर्व्यवहार के लिए क्षमा भी माँगी |

     एंजेल ने सुझाव दिया – “दादा जी के पश्चाताप स्वरूप इस शानदार हवेली की साफ सफाई करके यहाँ एक विद्यालय खोल दिया जाय | बाग की आमदनी से सारा खर्च निकल आयेगा | दादाजी को बुढ़ापे में बच्चों का साथ मिलेगा तो इन्हे शांति मिल जाएगी और बच्चों को हवेली के भूत से भी छुटकारा मिल जाएगा |”

   एक ज़ोर का ठहाका लगा | गाँव वालों ने एक स्वर से सहमति प्रदान कर दी | मामाजी ने खुशी से एंजेल को गोद मे उठा लिया | सारे लोग एक स्वर में बोल उठे – “बिटिया हो तो एंजेल जैसी |”






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किस्सा ढपोरशंख का : (बाल कहानी संग्रह) 

नीम भवानी : नीम वृक्ष पर आधारित प्रबन्ध काव्य

ठेलुहे   की शादी 


अजब अनोखी पद्य कथाएँ


डॉक्टर प्रेत: भुतही कहानियाँ 

कवि बौड़म डकैतों के चंगुल में: हास्य उपन्यास


खुद क्यों नहीं नहाते बादल : 38 बाल कवितायें (Hindi Edition)


लौट आओ गौरेया 



साहित्यकार परिचय - अरविन्द कुमार ‘साहू’

जन्मतिथि: 15-10-1969 (पन्द्रह अक्टूबर उन्नीस सौ उनहत्तर ई.)   
 जन्म स्थान: रायबरेली, उत्तर प्रदेश, भारत
प्रकाशित साहित्य : नीम भवानी (प्रबन्ध काव्य), विश्रान्ति (उपन्यास), कवि बौड़म डकैतों के चंगुल में (हास्य उपन्यास), परियों का पेड़ (बाल उपन्यास) किस्सा ढपोरशंख का, लौट आओ गौरैया (बाल कहानी संग्रह),                                             *ईबुक कवि बौड़म और समझदार गधा (हास्य उपन्यास) कवि बौड़म के कारनामे (संयुक्त उपन्यास), खुद क्यों नहीं नहाते बादल (बाल कविता संग्रह), डॉक्टर प्रेत (भुतही कहानियों का संग्रह) लेजर मैन का आतंक (मनोरंजक कहानी संग्रह), अजब अनोखी पद्य कथाएँ (कविताओं में कहानियाँ), कुछ बूझें कुछ ज्ञान बढ़ाएँ (बच्चों के लिए पहेलियाँ) |                                                     *शीघ्र प्रकाश्य (पांडुलिपियाँ)- जंगल में फटफटिया, सॉरी छुटकी,  स्मार्ट फोन (बाल कहानी संग्रह) कवि बौड़म की हास्य कथाएँ (संग्रह) पत्थर पर उगी दूब (कविता गीत संग्रह ) गजल एकादश (गजल संग्रह )THE TREE OF ANGELES (child fiction, परियों का पेड़ का अँग्रेजी अनुवाद)                                                                                                                                                                     पूर्व में प्राप्त पुरस्कारों/सम्मानों का विवरण : *साहित्यश्री, *भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) का प्रेमचंद जयन्ती सम्मान, *श्री जगदीश दुग्गड़ स्मृति राष्ट्रीय बाल साहित्य सम्मान एवं पुरस्कार 2016 *नेपाल-भारत मैत्री फाउंडेशन विशिष्ट प्रतिभा सम्मान 2017, *पं. रामानुज त्रिपाठी बाल साहित्य सम्मान 2018, *आर्य लेखक परिषद दिल्ली द्वारा साहित्य प्रज्ञा सम्मान *बाल साहित्य संस्थान कानपुर द्वारा प्रदत्त किशोर सम्मान व पुरस्कार 2019,*हम सब साथ साथ संस्था द्वारा विशिष्ट प्रतिभा सम्मान 2019 |                                                            अन्य साहित्यिक उपलब्धियाँ : पिछले 33 वर्षों से उपन्यास, कहानी, कविता, गजल, लेख आदि विभिन्न विधाओं में लेखन | बाल साहित्य में विशेष रुचि | नंदन, चंपक, बालभारती, पराग, नन्हें सम्राट, बालहंस, बालवाणी, बाल किलकारी, अपूर्व उड़ान, बाल वाटिका, बाल भास्कर, बच्चों का देश, बालभूमि, अच्छे भैया, दोस्त, कादंबिनी, नवनीत, आजकल, सूरज समाचार विचार, निर्भय पथिक, जनसत्ता, दैनिक जागरण, ट्रिब्यून, बालरंग आदि देश - विदेश की प्रमुख पत्र - पत्रिकाओं में 500 से अधिक रचनाएँ प्रकाशित |                                                               *अनेक कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ एवं विभिन्न साहित्यिक कार्यक्रमों व बाल साहित्य की रचनात्मक कार्यशालाओं, प्रशिक्षण सत्रों में भागीदारी, प्रतियोगिताओं के निर्णायक मण्डल सदस्य  | राष्ट्रीय सहारा (दैनिक समाचार पत्र) में संवाददाता रहे |*अखिल भारतीय विचार लेखन प्रतियोगिता में प्रथम स्थान|       

*सम्पादन अनुभव – अपूर्व उड़ान (बाल मासिक), जागरण जंक्शन में कार्यकारी संपादक रहे | मधुर सरस मासिक, सारा समय न्यूज एवं सुपर इंडिया साप्ताहिक में साहित्य संपादक तथा सूरज पॉकेट बुक्स एवं जयविजय (ई पत्रिका) मे सह संपादक रहे |                                                                                      सम्पर्क सूत्र (दूरभाष सहित) : साहू सदन, अकोढ़िया रोड, ऊँचाहार - रायबरेली (उप्र) पिन– 229404 मोबाइल : 7007190413 / 9838833434 ईमेल: aksahu2008@rediffmail.com     





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