साक्षात्कार : निशांत जैन

निशांत जैन, दुमछल्ला
image source: facebook

 निशांत जैन जी सन्मति प्रकाशन के प्रमुख हैं , ये विगत ८ वर्षों से प्रकाशक का कार्य कर रहें हैं .. अपनी पहली किताब 'दुमछल्ला' के साथ अब निशांत जी अब  लेखन के क्षेत्र में भी  कदम रख चुकें हैं .

निशांत जैन जी सबसे पहले आपको ढेरों बधाइयां। प्रकाशक के साथ साथ आपने लेखन के क्षेत्र में भी कदम रख दिया है। नई किताब दुमछल्ला के लिए शुभकामनाएं ।

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद


 Q शुरुआत में सबसे पहले अपने बारे में कुछ बताइये । कहाँ से है क्या करते है आप?

A-अपने बारे में बताने के लिए अभी इतना कुछ खास नहीं है । मूल रूप से मेरठ से हूँ और आधा चार्टर्ड अकाउंटेंट और कभी पूरा स्टॉक ब्रोकर था । लेकिन Pancreatitis बीमारी की वजह से अब सारा ध्यान प्रकाशन की तरफ है ।

Q आपके प्रकाशन  सन्मति प्रकाशन को कितना वक्त हो गया है । प्रकाशन की शुरुआत कैसे हुई थी । अबतक कितनी पुस्तकें प्रकाशित कर चुके है?

A-सन्मति पब्लिशर्स की शुरुआत पापाजी ने सन 2013 में की थी । पापाजी बिल्कुल सामाजिक प्राणी हैं और अपनी एक संस्था “आगमन” द्वारा नई प्रतिभाओं को सामने लाने की कोशिश करते रहते हैं । उसी दौरान प्रकाशन व्यवसाय की कई विसंगतियाँ पापाजी के सामने आईं और उन्हीं को दूर करने और लेखकों के लिए कुछ बेहतर करने के उद्देश्य से “सन्मति पब्लिशर्स” अस्तित्व में आया ।  मैं उस समय बस उनकी मदद करता था । अब तक लगभग 400 के करीब किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं ।

Q-प्रकाशक के तौर पर एक किताब को प्रकाशित करने में कितना वक्त लगता है । प्रकाशन हेतु क़िताबों का चयन कैसे करते है आप?

A-जैसा कि मैंने कहा कि प्रकाशन के क्षेत्र में काफी विसंगतियाँ हैं और उसी में एक शिकायत लेखकों कि यह थी कि प्रकाशन समूह बहुत ही ज्यादा समय लेते हैं और समय से कोई उत्तर भी नहीं देते हैं । इस परेशानी को हमने “सन्मति पब्लिशर्स” से पूरी तरह दूर कर दिया है ।  “सन्मति पब्लिशर्स” में एक बुक प्रकाशित करने में लगभग 45 दिन का समय लगता है । पांडुलिपि का चयन बहुत सारी बातों पर निर्भर करता है लेकिन हमारा चयन का मुख्य आधार, लेखक का लेखन की तरफ रुझान, उनकी इस क्षेत्र में भविष्य के लिए सोच और व्यवहार पर निर्भर करता है । पांडुलिपि की भी अपनी अहमियत होती है लेकिन लेखनी में सुधार वक़्त के साथ और लगातार दूसरे लेखकों को पढ़ने के साथ आ जाता है ।

Q प्रकाशक से लेखक बनने का विचार कैसे आया?  पहली किताब को लिखने में कितना वक्त लगा? 

A-पापाजी को लिखने का शौक हमेशा से रहा है तो उसका असर मेरे खून में भी आया । कुछ-कुछ लिखता रहता था लेकिन कभी गंभीरता से लेखन नहीं किया, समय ही नहीं मिलता था । जब पापाजी ने प्रकाशन की शुरुआत की थी तो तभी सोचा कि कुछ लिखा जाए । उस समय मैं सोशल मीडिया पर नहीं था तो ज्यादा लेखक नजर नहीं आते थे लेकिन धीरे-धीरे अहसास होने लगा कि यहाँ पर भी काफी प्रतिस्पर्धा है । पहले अपना नॉवेल मैंने “Absolute Absence” के नाम से 2014 में अंग्रेजी में लिखना शुरु किया जो 2017 तक पूरा हो सका । फिर बीमारी की वजह से कुछ नहीं कर सका । लेकिन 2018 तक खुद को सोशल मीडिया पर एक्टिव कर चुका था और हिंदी के प्रति प्यार बढ़ गया था । इसी वजह से लॉकडाउन के दौरान पूरे उपन्यास को हिंदी में लिखा जो अब जाकर रिलीज़ हो रहा है, नाम है, “दुमछल्ला”


 Q आपकी  किताब दुमछल्ला किस विधा और विषय पर आधारित है । और किताब का शीर्षक दुमछल्ला कैसे पड़ा?

A- दुमछल्ला” एक उपन्यास है और यह किसी भी इंसान की व्यक्तिगत आज़ादी से जुड़ा है ।  आप और हम सभी एक कहावत बरसों से कहते व सुनते आए हैं कि “कुत्ते की दुम बारह साल भी नली में रखो तो भी सीधी नहीं होती ।” उसके विरोधाभास एक कहावत यूँ भी है कि, “कुत्ते सा वफादार कोई जानवर नहीं होता ।”

बात बिल्कुल सही है । अपनी ज़िन्दगी में हमें जीने के लिए विश्वास करना ही होता है । लेकिन वही विश्वास हमारे जीने में बाधाएँ उत्पन्न करने लगे तो उस रिश्ते के संग फिर घुटन होने लगती है ।  हम इंसान वफ़ादार तो होते हैं लेकिन हम अपने रिश्ते को बाँधकर रखने की कोशिश में लगे रहते हैं; बिल्कुल उस पूँछ की तरह जिसे चाह कर भी सीधा नहीं किया जा सकता, हाँ मगर उसे काटा ज़रूर जा सकता है । ऐसी घुटन से बचने के लिये उसे काटने की ख़्वाहिश भी सभी रखते हैं । लेकिन कितने लोग इसे काटने में कामयाब हो पाते हैं?

सामाजिक रिश्तें कभी इतने आसान नहीं होतें जितने वे दिखते हैं । कोई समझौता करता है तब जाकर किसी एक को आजादी मिलती है । यदि दोनों को एक सी आजादी चाहिए तो, एक दूसरे से आजाद होना पड़ता है । रिश्ते को बेहतर बनाने की कोशिश में, समय के साथ, हम इतना उलझ चुके होतें हैं कि सामने वाले की भावनाएँ, अपेक्षाएँ या उसका सम्मान भूल जाते हैं । 

समाज की दीवार के बल दुमछल्ला बनकर हम ऐसे खड़े हो जाते हैं कि एक ही ज़िन्दगी को गोल-गोल जीने लगते हैं । हर दिन एक जैसा शुरू होता है, और ख़त्म हो जाता है । वह दुमछल्ला कब उनके गले को आहिस्ता-आहिस्ता दबाने लगता हैं पता भी नहीं चलता । जीने की ख़्वाहिश छोड़कर अंदर ही अंदर सिकुड़ने लगते हैं, अपना अस्तित्व खो देते हैं । 

बस यही “दुमछल्ला” का आधार है ।


Q कौनसा काम ज्यादा मुश्किल है? प्रकाशक का या लेखक का? अपनी राय दीजिये ।

A-दोनों की अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं । एक लेखक अपने सपनों को पन्नों पर उतारता है और एक प्रकाशक लेखक के सपनों को पाठक तक पहुँचाने का एक सशक्त माध्यम है ।


Q भविष्य में भी लेखन जारी रखेंगे? आगामी प्रोजेक्ट्स क्या है आपके? और किन विधाओ में लिख रहे है आप?

A- हहाहाहा.... बड़ी मुश्किल से एक उपन्यास पूरा किया है । यह मजाक की बात थी लेकिन लिखने में आनंद बहुत आया । और लिखने के दौरान जब मैं उन घटनाओं का साक्षी बनकर खुद को काल्पनिक पात्र के सामने खड़ा महसूस करता था तो वो एक अलग ही अनुभव होता था । अब समझ आया कि लेखक हमेशा शांति और एकांत क्यूँ ढूंढते हैं, लिखने के लिए । अभी नया कुछ सोचा नहीं है क्यूँकि अभी “दुमछल्ला” का ही आनंद लेना चाहता हूँ । आगे जो भी लिखूंगा वो या तो उपन्यास होंगे या कहानियाँ ।


Q लेखन की प्रेरणा कहाँ से मिली? पसंदीदा लेखक और किस तरह की किताबें पढ़ने का शोक रखते है आप?

A-लेखन की प्रेरणा तो पापाजी से ही मिली । कुछ-कुछ लिखने की आदत थी, कभी मेरा लिखा पढ़ लेते तो कहते कि, “अच्छा लिखता है, अलग सोच है, समय के साथ निखर जाएगा ।”

पसंदीदा लेखक तो सभी के वही पुराने हैं लेकिन नए लेखकों को भी पूरी शिद्दत के साथ पढ़ता हूँ ।



Q लेखन/प्रकाशन के अलावा और किन चीजों का शौक रखते है आप?

A-स्टॉक मार्किट में आज भी मुझे आनंद आता है और वहाँ पर भी कुछ न कुछ करता रहता हूँ । इसके अलावा, अगर मुझे कुछ नहीं करना तो सारे दिन सोना चाहता हूँ


Q अंत मे युवा लेखकों के लिए क्या संदेश देना चाहेंगे आप?

A-युवा लेखक अच्छा कर रहे हैं । उनसे मेरी बस एक ही शिकायत है कि पढ़ते कम हैं । संदेश तो कुछ नहीं है बस एक गुज़ारिश करना चाहूँगा कि ज्यादा से ज्यादा पढ़िए । 10 पेज लिखने हैं तो उसके एवज में 50 पेज पढ़िए । जितना पढ़ेंगे उतना ही लेखनी में सुधार आएगा । बाकी बस जो कर रहें हैं, करते रहिए क्योंकि “कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती....”





अन्य साक्षात्कार -

साक्षात्कार:विकास भांती





 

एक टिप्पणी भेजें

1 टिप्पणियाँ

  1. अरे वाह, लेखक स्वयं एक प्रकाशक हैं, हम भी छोटे से लेखक है, कभी सम्पर्क करेंगे।

    जवाब देंहटाएं