साक्षात्कार : मनमोहन भाटिया

साक्षात्कार : मनमोहन भाटिया 


दिलवालों के शहर दिल्ली के मूल निवासी मनमोहन भाटिया जी की गिनती हिंदी साहित्य के  ऐसे लिखकों में की जाती है, जिन्होने जीवनयापन  के लिए निजी क्षेत्र की बहुत सी कंपनियों में  विभिन्न पदों पर कार्य करते हुए भी अपने लेखन के जुनून को बरकरार रखा ,और कई दशकों से वर्तमान समय तक लेखनकर्म व साहित्य सेवा में सक्रिय है।

आपकी रचनाएँ, सालों से देश के प्रतिष्टित समाचारपत्र- नवभारत टाइम्स, व अनेको राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं जैसे- सरिता, गृहशोभा आदि की शोभा बढ़ाती आ रही हैं ।  भाटिया जी की कहानी 'ब्लूटर्बन' व 'अखबार वाला' का तेलगु व ऊर्दू भाषा मे अनुवाद भी हो चुका है।

नए दौर में नए वक़्त की नई धारा के अनुरूप खुद को ढालते हुए मनमोहन जी ने 'प्रतिलिपि' ' पॉकेट fm' 'कुकू fm' जैसे  लेखन के नए डिजिटल प्लेटफार्म पर  भी काम किया है।
कुकू fm पर मनमोहक जी की कहानियों के 80 से ज्यादा ऑडिओ वर्ज़न उपलब्ध हैं।

सेवानिवृत्त होने के बाद मनमोहन जी अब एक फुलटाइम लेखक बन चुके है, तथा विगत दो वर्षों में 10 पुस्तकें प्रकाशित करवाने  के बाद भी साहित्य साधना में सतत सक्रीय हैं ..

interview
manmohan  bhatiya



मनमोहन जी की साहित्यिक यात्रा इस बात का उदाहरण है कि उम्र महज़ एक संख्या भर है ,और  मेहनत, लगन और होंशले हो तो दुनियां में असंभव कुछ नही
मित्रों ! आज हम रूबरू होने जा रहे है मनमोहन भाटिया जी से .और जानेंगे उनकी साहित्यिक यात्रा से संबंधित  कुछ रोचक तथ्य .

प्रश्न - मनमोहन जी अपने बारे में कुछ बताइये आप, कहाँ से है ? क्या करते है?

उत्तर - मेरा जन्म देश की राजधानी लोगों के दिल दिल्ली में 29 मार्च 1958 को हुआ। मेरा परिवार कपड़ा व्यवसाय से जुड़ा था। 1958 से 1988 तक मैं पुरानी दिल्ली में रेलवे स्टेशन के नजदीक श्यामा प्रसाद मुखर्जी मार्ग में रहा हूँ। हमारा परिवार सयुंक्त परिवार था। मेरे पिता और दो ताऊ एक साथ रहते थे और सयुंक्त व्यवसाय था। हम चार भाई बहन में मैं तीसरे नंबर पर हूँ। मेरे से बड़े भाई, बहन और मेरे से छोटी बहन। दोनों ताऊ के बच्चे मेरे से बड़े थे।

मेरा बचपन पुरानी दिल्ली में बीता। घर के समीप स्कूल जिसका नाम राय साहब लक्ष्मी नारायण गिरधारी लाल सीनियर सेकेंडरी स्कूल था, मैंने कक्षा ग्यारह तक पढ़ाई की। मेरे स्कूल के समय 8 + 3 का सिस्टम था। हमें आठवीं और ग्यारहवीं कक्षा की बोर्ड की परीक्षा देनी होती थी। कक्षा 9 में हमें कॉमर्स, आर्ट या साइंस में से एक विषय चुनना होता था। व्यापारी पिता के पुत्र होने के नाते मैंने कॉमर्स विषय चुना। आज के युवा वर्ग को एक बात बताना चाहता हूँ कि उस समय हम कक्षा 9 में किताब खरीदते थे जो कक्षा 9, 10 और 11 में पढ़ते थे। लगभग 33 प्रतिशत कोर्स एक कक्षा में पढ़ते थे और 3 साल की पढ़ाई की बोर्ड परीक्षा होती थी। स्कूल की शिक्षा के पश्चात मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से बी.कॉम और एलएलबी की डिग्री हासिल की। 1974 में ग्यारहवीं बोर्ड परीक्षा के बाद 1977 में हिन्दू कॉलेज से बी.कॉम और कैंपस लॉ सेंटर से 1980 में एलएलबी की डिग्री हासिल की।

पढ़ाई के बाद पिता के व्यापार में कुछ वर्ष हाथ बटाने के बाद नौकरी की। निजी क्षेत्र की विभिन्न कंपनियों में कार्यरत होने के बाद 31 अगस्त 2019 में सेवानिवृत्त हुआ। नौकरी के दौरान मैं दिल्ली में ही रहा। ऑफिस टूर पर देश के कई शहरों को देखने का मौका मिला। मेरा कार्यक्षेत्र वित्त, एकाउंट्स और टैक्स रहा। मेरी विशेष रुचि इनकम टैक्स में रही और अधिकांश कार्य इनकम टैक्स के इर्दगिर्द रहा।

मैं 1958 से 1988 तक पुरानी दिल्ली में रहा। 1988 से अब मेरा निवास रोहिणी में है।

सेवानिवृत्त होने के बाद से मैं अब सिर्फ लेखक हूँ। लेखक के साथ मैं एक पाठक भी हूँ।


प्रश्न - मनमोहन जी अब तक आप कितनी किताबें लिख चुके है लेखन की शुरुआत कैसे हुई?

उत्तर मैं अब तक 10 किताबें लिख चुका हूँ। फ्लाई ड्रीम्स पब्लिकेशन्स से 8 किताबें प्रकाशित हैं।

  • 1.       कहानी संग्रह "भूतिया हवेली" सितंबर 2018 प्रकाशक "फ्लाई ड्रीम्स पब्लिकेशन्स"
  • 2.       कहानी संग्रह "रिश्तों की छतरी" मार्च 2019 प्रकाशक "फ्लाई ड्रीम्स पब्लिकेशन्स"
  • 3.       उपन्यास "कुछ नही" अगस्त 2019 प्रकाशक "फ्लाई ड्रीम्स पब्लिकेशन्स"
  • 4.       कहानी संग्रह "पुरानी डायरी" मई 2020 प्रकाशक "फ्लाई ड्रीम्स पब्लिकेशन्स"
  • 5.       कहानी संग्रह "हौसला" अगस्त 2020 प्रकाशक "फ्लाई ड्रीम्स पब्लिकेशन्स"
  • 6.       उपन्यास "अदृश्यम" नवंबर 2020 प्रकाशक "फ्लाई ड्रीम्स पब्लिकेशन्स"
  • 7.       कहानी संग्रह "रसरंग" जनवरी 2021 प्रकाशक "फ्लाई ड्रीम्स पब्लिकेशन्स"
  • 8.       कहानी संग्रह "फासले" जनवरी 2021 प्रकाशक "फ्लाई ड्रीम्स पब्लिकेशन्स"

इसके अत्तिरिक्त 2 किताबें किंडल पर स्वयं प्रकाशित की हैं।

1.       काव्य संग्रह दिल से

2.       प्रार्थना संग्रह  प्रार्थनाएंइसमें श्लोक हिन्दी, अंग्रेजी और संस्कृत में हैं।

एक ऑडियोबुक धारावाहिक "तुम्हारी काव्या" ,पॉकेट एफएम पर है।

कुकु एफएम पर लगभग 80 से ऊपर कहानियों के ऑडियो हैं। सभी ऑडियो मेरी प्रकाशित कहानियों के हैं।

मेरी दो कहानियों का अनुवाद भी हुआ है।

1.       कहानी ब्लू टरबन का तेलुगु अनुवाद। अनुवादक: सोम शंकर कोल्लूरि

2.       कहानी अखबार वालाका उर्दू अनुवाद। अनुवादक:  सबीर रजा रहबर (पटना से प्रकाशित उर्दू समाचार पत्र इनकलाब के संपादक) बिहार उर्दू अकादमी के लिए।

लेखन की शुरुआत

बचपन में मेरी नानी मुझे कहानियां सुनाया करती थी। नानी राम और कृष्ण के जीवन से संबंधित छोटी छोटी कहानियां सुनाती थी। कहानियों को सुनकर मेरा रुझान कहानियों की तरफ बढ़ा। संयुक्त परिवार में मेरे से बड़े ताऊ के बच्चे उपन्यास पढ़ते थे। वो दौर गुलशन नंदा और राजहंस के उपन्यासों का था। उपन्यास प्रतिदिन के हिसाब से किराए पर मिलते थे। उन उपन्यासों को मैं भी उलट पलट लिया करता था परंतु छोटी उम्र होने के कारण मुझे अधिक समझ में नही आते थे। स्कूल की पाठ्यक्रम की पुस्तकों में मुंशी प्रेमचंद की पंच परमेश्वर और ईदगाह पढ़ी।

पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के ठीक सामने दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी थी जहाँ ढेरो अनगिनित पुस्तकों का भंडार था और शाम के समय साहित्यिक समारोह भी हुआ करते थे, यह मैं अपने स्कूल के दिनों की बात बता रहा हूँ, 1968 से 1973 तक की बात है। स्कूल अध्यापकों ने हम स्कूल विद्यार्थियों को लाइब्रेरी का सदस्य बनवाया और हम नियमित रूप से लाइब्रेरी से पुस्तकें ला कर घर पर आराम से पढ़ा करते थे। हम एक साथ दो पुस्तकें 15 दिन तक रख सकते थे। यहाँ से मेरी साहित्य में रुचि जागृत हुई।

बचपन में नंदन, चंपक और चंदामामा पत्रिकाओं को खूब पढ़ा।

कॉलेज में बी.कॉम के कोर्स में मेरा हिंदी वैकल्पिक विषय था जो सिर्फ एक वर्ष पढ़ना था। कोर्स में मुंशी प्रेमचंद का उपन्यास गबन पहली बार पढ़ने का अवसर मिला। सही मायनों में साहित्य की समझ, लगन और प्रेम 'गबन' से आरंभ हुआ।

विवाह के बाद पत्नी नीलम भाटिया हिंदी पत्रिका पढ़ती थी जिनमें सरिता, गृहशोभा, मुक्ता प्रमुख थी। मैं उन पत्रिकाओं में कहानियों को पढ़ना पसंद करता था।

1998 में सामाजिक मुद्दों पर मैंने अपनी राय समाचारपत्रों में letter to editor के माध्यम से रखनी आरंभ की। हिंदुस्तान टाइम्स, नवभारत टाइम्स, इंडिया टुडे, सरिता, इकोनॉमिक्स टाइम्स और कई अन्य पत्र पत्रिकाओं में नियमित रूप से पत्र प्रकाशित होते रहे। मुख्यतः मैं अंतर्मुखी हूँ, ऑफिस में सहपाठियों के संग चर्चा और विचार विमर्श में मैंने महसूस किया, बेफजूल वादविवाद में समय बर्बाद करने से बेहतर पत्र, पत्रिकाओं के माध्यम से अपने विचार व्यक्त करना है। अभी 4, 5 वर्ष पहले तक मैं नियमित रूप से लिखता था फिर इंटरनेट क्रांति में फेसबुक और सोशल मीडिया के बढ़ते चलन से अब इंग्लिश न्यूज़पेपर में letter to editor लगभग समाप्त ही हो गया है, हालांकि मुझे इस बात की खुशी है कि हिंदी समाचारपत्रों में पाठकों के पत्र अच्छी संख्या में प्रकाशित होते हैं।

2004 में मेरी उम्र 46 वर्ष थी। इस उम्र में बच्चों की जिम्मेदारी से मैं लगभग फ्री हो गया था। उम्र के इस पड़ाव पर जीवन में कुछ ठहराव आए, कुछ अपने लिए समय मिलने लगा। अब शनिवार और रविवार अवकाश मिलने लगा। खाली समय में साहित्य पढ़ते स्वयं ही लिखने की इच्छा जागृत हुई। सच में कहूँ इच्छा दिल्ली प्रेस की वार्षिक कहानी प्रतियोगिता को देख कर हुई। अब क्या लिखूं, कैसे लिखूं, इस समस्या से जूझने में मुझे दो वर्ष लग गए और मैं लिख नही सका। 2004 के बाद 2005 की भी वार्षिक कहानी प्रतियोगिता चली गई और मैं सोचता रह गया। इन वर्षों में मैं बस पढ़ता रहा। 2006 की वार्षिक कहानी प्रतियोगिता में दृढ़ निश्चय कर के मैंने तीन कहानियां लिखी। कहानी 'लाइसेंस' को प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार 3000 रुपये का मिला। द्वितीय पुरस्कार के साथ धनराशि ने मेरे अंदर के लेखक को जागृत किया और मैंने नियमित रूप से लिखना आरंभ किया। प्रतियोगिता में भेजी गई मेरी दूसरी कहानी 'वो बच्चे' भी प्रकाशित हुई, तीसरी कहानी रिजेक्ट हो गई। दोनों कहानियां सामाजिक विषयों पर आधारित थी जो मैंने अपने इर्दगिर्द महसूस किया था। विख्यात मोटिवेटर दीपक चोपड़ा के पिता कृष्ण चोपड़ा की एक पुस्तक 'आपका जीवन आपके हाथों में' पढ़ी। पेशे से डॉक्टर कृष्ण चोपड़ा ने कहानियों के माध्यम से बीमारियों के बारे में लिखा। मुझे उनके लिखने की विद्या पसंद आई और मैंने सामाजिक मुद्दों पर अपनी राय को कहानियों के माध्यम से लिखना आरंभ किया मेरी कहानियां दिल्ली प्रेस की पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी। मेरा हौसला और आत्मविश्वास बढ़ा। सामाजिक मुद्दों के साथ मैंने प्रेम और हॉरर की भी कहानियों को लिखना आरंभ किया।

प्रश्न -अपनी लिखी किताबों रचनाओं में आपकी पसंदीदा किताब या रचना कौन सी है और क्यों?

उत्तरआपने धर्मसंकट में डाल दिया। माता-पिता को सभी बच्चे पसंद होते हैं। अब चुनाव करना एक कठिन कार्य है। यह आपके अनुरोध पर निर्णय ले रहा हूँ। "रिश्तों की छतरी" मेरी सबसे अधिक पसंदीदा प्रकाशित किताब है। निर्णय लेने के पीछे एक कारण है, इस किताब का द्वितीय संस्करण प्रकाशित हुआ है और सभी समीक्षाएं सकारात्मक प्राप्त हुई है। पाठकों के साथ प्रकाशक का विश्वास और भरोसे के कारण "रिश्तों की छतरी" मेरी पसंदीदा किताब है। इस किताब में जीवन और रिश्तों के महत्व को उजागर करते हुए कहानियों का तानाबाना बुना है। किताब में पति-पत्नी के अटूट प्रेम के साथ अन्य रिश्तों को दर्शाया है, जिनका हमारे जीवन में अक्सर महत्वपूर्ण योगदान रहता है। किताब के अतिरिक्त मैं एक कहानी "मस्ती" का जिक्र करूँगा। यह कहानी सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली कहानी है जिसमें मैंने आजके युवा वर्ग और अधेड़ दम्पति के विचार आजकी जीवनशैली पर प्रस्तुत किए हैं। जहाँ युवा आजाद रहना चाहता है और अधेड़ मान्यताओं के दायरे में।

प्रश्न - एक किताब लिखने में आपको कितना वक्त लगता है। रिसर्च को कितना महत्व देते हैं आप?

उत्तर - रिसर्च आवश्यक है। जब हम किसी विषय पर अपनी कलम चलाते हैं, तब हमें उस विषय का ज्ञान होना चाहिए। बिना ज्ञान, रिसर्च के कच्ची कहानी ही लिखी जाएगी और हमारी जगहंसाई होगी।

यहाँ तक आपने समय के बारे में पूछा है तो मैं अपना अनुभव सांझा करता हूँ। सर्वप्रथम कहानी या उपन्यास के मुख्य बिंदुओं को नोट करता हूँ। फिर लिखना आरम्भ करता हूँ। लघुकथा जो 1000 शब्दों से कम की होती है, वह एक से दो घंटे में लिखी जाती है। बड़ी कहानी 1000 से 3000 शब्दों के लिए चार से पांच घंटे लगते हैं। 3000 से 5000 शब्दों की कहानी को सात से आठ घंटे लगते हैं।

उपन्यास लिखने में हर रोज कुछ कुछ लिखते हुए तीन महीने तक लग जाते हैं, उसके सम्पदान में भी एक से दो सप्ताह लग जाते हैं।

प्रश्न- आपके आगामी प्रोजेक्ट्स क्या हैं। आगे किस तरह की किताबें पाठकों को मिलने वाली है?

उत्तर - अभी मैं एक हॉरर उपन्यास लिख रहा हूँ। दो उपन्यासों की रुपरेखा तैयार कर रहा हूँ। एक फंताशी है और दूसरा हास्य व्यंग्य में। हॉरर लिखने के पश्चात इन उपन्यासों को आरम्भ करूँगा।

वैसे मेरा एक कहानी संग्रह किंडल पर कभी भी सकता है। इसके अतिरिक्त मेरे 10 उपन्यास फ्लाई ड्रीम्स पब्लिकेशन्स के पास विचाराधीन हैं। ये हॉरर, फंताशी, सामाजिक, हास्य और थ्रिलर श्रेणी में हैं। अगले दो वर्ष में आपको मेरे कम से कम 10 नए उपन्यास अवश्य पढ़ने को मिलेंगे। मैं साथ के साथ लिखता भी जा रहा हूँ। आगामी किताबों की संख्या बढ़ती जाएगी।

प्रश्न- लेखन के अलावा पाठन की बात की जायँ तो आपके पसंदीदा लेखन को है और किस तरह का साहित्य पढ़ना पसन्द है आपको?

उत्तर - मैं हर श्रेणी का साहित्य पढ़ता हूँ। हॉरर, थ्रिलर, सामाजिक, प्रेम, हास्य, फंतासी के अतिरिक्त आध्यात्मिक, पौराणिक, धार्मिक, मोटिवेशन सभी पढ़ता हूँ। इसी कारण मैं अलग श्रेणियों में लिखता हूँ। पसंदीदा लेखकों में मुंशी प्रेमचंद, शरतचन्द्र, रविन्द्र नाथ टैगोर, सत्यजीत रे, तस्लीमा नसरीन, खुशवंत सिंह, अमृता प्रीतम, आर के नारायण, रस्किन बांड पसन्द हैं। वर्तमान लेखकों में फ्लाई ड्रीम्स पब्लिकेशन्स और सूरज पॉकेट बुक्स के सभी लेखक पसन्द हैं और उनकी किताबें पढ़ी हैं।

प्रश्न- साहित्य लेखन-पाठन के अतिरिक्त और किन चीजों का शौक रखते हैं आप?

उत्तर - भ्रमण के अतिरिक्त हर किस्म का हिन्दी और पंजाबी संगीत, ग़ज़ल, भजन सुनना और हिन्दी, पंजाबी फिल्मों को देखना पसन्द है।

प्रश्न-वर्तमान समय  में जहां सूचना तकनीक विज्ञान इतना उन्नत हो चुका है,कि लेखकों की किताब  रिलीज़ होते ही pdf के रूप में बंटनी शुरू हो जाती है। लेखकों के साथ साथ पायरेसी उन प्रकाशकों के लिए भी एक गंभीर समस्या   संकट है जो अपना श्रम धन लगाकर पुस्तकों को प्रकाशित कर रहे हैं।।  पायरेसी से लड़ने के  लेखक  अपने स्तर पर क्या कर सकते हैं? अपने विचार व्यक्त कीजिए।

उत्तर - पायरेसी एक अपराध है। लेखक और प्रकाशक अपने स्तर पर पीडीएफ की पायरेसी रोकने के लिए प्रयत्नशील हैं। भारत में न्यायप्रक्रिया लचर है जिसका फायदा अभी पीडीएफ चोर उठा रहे हैं लेकिन चाहे देर से, पुलिस उनकी थर्ड डिग्री कुटाई, ठुकाई करेगी, तब उनको अक्ल आएगी। वो दिन दूर नहीं है। इसलिए मैं पीडीएफ चोरों से विन्रम विनती करता हूँ, वे किताबें खरीद के पढ़े। किताबें खरीदना सस्ता है। पीडीएफ चोर अपने सिगरेट, बीड़ी, तम्बाकू, गुटका, शराब पर मासिक खर्च में से मात्र 500 रुपये की कटौती करके किताबें खरीद कर पढ़े। किताब खरीद कर पढ़ने के तीन फायदे हैं, उनका बौद्धिक विकास होगा और दूसरा सिगरेट, बीड़ी, तम्बाकू, गुटका, शराब पीने से उनका स्वास्थ्य बढिया होगा। डॉक्टरों का खर्चा कम होगा। और तीसरा फायदा होगा कि पुलिस के डंडे नहीं खाने पड़ेंगे।

प्रश्न- आपकी अधिकांश पुस्तकें फ्लाईड्रीम्स पब्लिकेशन्स से प्रकाशित हुई है। फ्लाईड्रीम्स पब्लिकेशन्स के साथ काम आपका अनुभव कैसा रहा !?

उत्तर - मेरा फ्लाई ड्रीम्स के साथ अनुभव बहुत अच्छा रहा है। 8 किताबों के प्रकाशन के बाद कम से कम 11 और किताबों का प्रकाशन विचाराधीन हैं। और किताबें भी लिख रहा हूँ। आशा करता हूँ, वे भी फ्लाई ड्रीम्स से प्रकाशित होंगी। वे किताबें कुछ हट कर छाप रहे हैं। नए पुराने सभी लेखकों के लिए उनके द्वार खुले हैं। किताब प्रकाशन पर उनसे घंटों बातें होती है। उनकी साफगोई बहुत पसन्द है। उनका साथ बना रहे, यही ईश्वर से विनती है। किताबें प्रकाशित होती रहें। बस इतनी छोटी सी ख्वाहिश है। जयंत मेरे पुत्र की उम्र से भी छोटे हैं, जब भी बात होती है, मित्रों की भांति बात होती है। विन्रम स्वभाव के जयंत और मिथिलेश ऊर्जा के स्त्रोत है। मुझ जैसे वरिष्ठ नागरिक के जीवन में लिखने की ऊर्जा उत्पन्न करने का हर यथासंभव प्रयास करते हैं।

प्रश्न-अंत मे अपने पाठकों युवा लेखकों को क्या संदेश देना चाहेंगे आप?

उत्तर - पाठकों को संदेश दूँगा, वे किताबें पढ़ते रहें। पढ़ने से बौद्धिक विकास होता है। वे हर शैली, श्रेणी, विधा की किताबें पढ़े। जैसे हम एक प्रकार की सब्जी, दाल हर रोज नहीं खाते, वैसे पढ़ने में भी विविधता होनी चाहिए।

लेखकों से अनुरोध करूँगा, वे सब्र रखें। लिखना हमारा कर्म है, कर्म से पीछे हटें। फल अवश्य मिलेगा, श्रीकृष्ण का भी यही गीता ज्ञान है। आप मेरा लेखन जीवन देखें। मैंने 2006 से लिखना आरम्भ किया। पहली किताब 12 साल बाद 2018 में छपी। जब भी समय मिले, पढ़े और लिखें। आशावादी रहें, सकारात्मक विचारों से लिखें, सफलता आपको अवश्य मिलेगी। यही मेरे जीवन का अनुभव और मूलमंत्र है।

आप मुझसे मेरे ईमेल manmohanbhatia@hotmail.com पर कभी भी सम्पर्क कर सकते हैं।

साक्षात्कार के लिए अपना कीमती समय देने के लिए धन्यवाद मनमोहन जी.. आशा करते हैं की आप भविष्य में भी यूँ ही लेखउपलब्नध कर्म करते रहेंगे और और युवा लेखकों को प्रेरणा देते रहेंगे .


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