पुस्तक समीक्षा :एक ही अंजाम :जेम्स हेडली चेईज

 

एक ही अंजाम !

Like a Hole in the Head

जेम्स हेडली चेईज 
अनुवाद : कँवल शर्मा



Like a Hole in the Head



दोस्तों कभी -कभी हम एक किताब से कुछ खाश अपेक्षाएं रखते है, लेकिन हर बार वैसा ही हो ये जरूरी नही!

कुछ उपन्यास हमारे सर के उप्पर से जाते है, वैसी सी ही किताब है -एक ही अंजाम या फिर लाइक अ होल इन दी हेड

समीक्षा पढने से पहले एक बार शीर्षक पढ़कर सोचिये .. कहानी में क्या होने वाला है ।

  • जेम्स हेडली जेम्स हेडली चेईज की किताब है ,तो फिर सस्पेंस थ्रिलर ही होगी।
  • ढेर सारी मारधाड़ भी होगी।
  • अंत मज़ेदार होगा. और दिमाग का दही कर देगा।

लेकिन दुनिया हमारी सोच के हिसाब से चलने लगे तो फिर क्या मज़ा? फिर तो जींदगी निरस हो जाएगी .

और वैसे भी असली मज़ा तो अज्ञात में हैं ,यानि की सस्पेंस में जीने में है।


कहानी का प्रमुख पात्र और कथावाचक है- वेंसन  AKA - J

जो एक भूतपूर्व सैनिक होता है, और सेना का दुसरे नंबर का सबसे माहिर निशानची होता है।

श्रीमान 'जे' ने सेना में 3 साल तक वियतनाम के जंगलों में एक गुप्त स्थल में शूटिंग की थी।

और तीन साल तक तक अन्य सैनिकों को निशानेबाजी के लिए प्रशिक्षित भी किया था।

कुल मिला कर देखा जाए तो मिस्टर 'जे' एक पेशेवर स्नाइपर था। अपनी इसी काबिलियत के चलते जे रिटायर्मेंट के बाद पैराडिज़ सिटी के पास एक शूटिंग स्कूल खोलता है।

पैसे की तंगी के चलते व् स्कूल की खस्ताहाल हालत के कारण वेंसन यानी कि J के पास जादा स्टूडेंट नही होते,  इसलिए वो अपने व अपनी पत्नी लूसी के भविष्य के प्रति चिंतित रहता है।


वेंसन की पत्नी लूसी एक चंचल स्वभाव की औरत है।

जो उसके शूटिंग स्कूल वाले काम में वेंसन का कोई खास सहयोग तो नही देती, लेकिन उसकी हाँ में हाँ जरुर मिलाती रहती है।


मैंने कहा “ इतना उतेजित होने की जरुरत नही है , बहुत सा सुधार तो हम खुद भी कर सकते हैं . थोडा सा पेंट, कुछ ब्रश लाकर, और थोड़ी सी मेहनत करके हम इस जगह को चमका सकते है . क्या ख्याल है ?”


उसने कहा, "जे अगर तुम ऐसा कर सकते हो तो ठीक है .”

मैंने उसे गौर से देखा।


 इन संवादों से आपको पता चल गया होगा कि 'लूसी' 'जे' के काम में हाथ बाटने में कितनी रूचि रखती हैं।

खैर फिर से कहानी पर आते है।


जैसा कि अबतक आपने जाना कि वेंसन एक भूतपूर्व फोजी था, जो रिटायर्मेंट के बाद एक शूटिंग स्कूल खोलता है। उसका स्कूल उतना अच्छा नही चल रहा जितनी उसे उम्मीद थी।


फिर एक दिन एक साठ वर्ष का रईस बूढा आदमी  'सावंतो' वहां आता है, और वेंसन से कहता है कि अगर उसने उसके बेटे 'तिमोतियो' को 9 दिन में एक माहिर निशानेबाज़ बना दिया, तो सावंतो उसे ६ हज़ार डॉलर्स देगा।


लेकिन 'तिमोतियों' के बन्दूक पकड़ने में उसकी रूचि न होने की बात j यानि 'वेंसन' भांप लेता है, और, 6 हजार डॉलर्स के प्रस्ताव को ठुकरा देता है ।


फिर 'सावंतो' उसे ५० हज़ार डॉलर्स का ऑफर देता है ।


काफी सोच विचार कर एक चमत्कार की आशा में वेंसन सावंतो को हाँ कर देता है।

 इतनी बड़ी रकम मिलने पर जे खुश था,किन्तु अभी तक उसे समझ नही आ रहा था कि सावंतो उसे इतनी बड़ी रकम क्यों दे रहा है।


'जे' के पूछने पर 'सावंतो' बताता है, कि उसके एक दोस्त ने ५ लाख डोलर  की शर्त रखी है, अगर उसका बेटा तिमोतियों 9 दिन में माहिर निशानेबाज़ बन गया तो उसे ५ लाख डॉलर्स मिलेंगे।


उसके बाद शुरू होती है 'तिमोतियों' की ट्रेनिंग


तिमोतियों को शुरू से ही शूटिंग में कोई काश रूचि नही होती है।

लेकिन उसे जे की पत्नी लूसी के साथ बतियाना काफी पसंद होता है।

अब आप समझ ही गे होंगे कि मामला कहाँ जाने वाला है।

साम -दाम- दंड -भेद व अपने फौजीयों वाले सारे पैतरे आजमाने के बाद भी जब तिमोतियो रायफल चलाना नही सीख पाता ,तो अपनी किस्मत कोसता हुआ 'जे' 'सावंतो' से कहता है कि उसका बेटा कभी निशानेबाज नही बन सकता।

और उसे उसके ५० हज़ार डॉलर्स के चेक को लौटा देता है ।


अबतक जो आपने पढ़ा वो तो सिर्फ ट्रेलर था ..

असली मज़ा आगे आएगा .. (ऐसा मैंने भीं सोचा था)


J की बीवी लूसी को अगवा कर लिया जाता है।


J से कहा जाता है कि उसे अब एक आदमी; जो खुद सामंतो का भाई होता है, उसका क़त्ल करना होगा, नही तो लूसी को मार दिया जाएगा।

जे मामला समझ जाता है ।

अब आप सोच रहे होंगे की आगे क्या होता है ?

जे सावंतो से बदला लेगा।

और अपनी स्नाइपर स्किल से उसकी खोपड़ी का रोशनदान बना देगा।

मैंने भी एसा ही सोचा था।

लेकिन एसा हुआ नही!!

जैसा हम सोचे वेसा ही हो तो फिर क्या मज़ा .. सारी कथा -कहानी निरस हो जाएगी।

लेकिन कुछ कहानिया ऐसी होती है कि हमें अंत में पता लगता है कि हमें ठगा गया है।


जे कभी उस नोजवान तिमोतियों (जो रायफल उठाना तक नही जानता) की, तो कभी सावंतो के आदमी की मार खाता रहता है।

एसा लगता है की 'जे' खुद की कहानी में ही हीरो नही बल्कि कोई बॉलीवुड की फिल्मो में दिखाया जाने वाला मसखरा हो और विधाता ने दुनिया की साडी त्रासदी उसी के नसीब में लिख दी हो ।

हमारा 'जे' अपनी बीवी लूसी को खोजने में कामयाब भी हो जाता है , लेकिन उसे पता चलता है कि उसकी बीवी अब किसी और की हो चुकी है।


फिर कहानी में ऐसे ऐसे मोड़ आते हैं कि  'जे' का खून खौल जाता है ,

 अंत में जे फैसला करता है कि वो 'तिमोतियों' के पिता 'सावंतो' को मारकर बदला लेगा। क्यूंकि सबकुछ उसी के कारण हुआ ..


'जे' जो सेना में दुसरे नंबर का माहिर निशानेबाज़ होता है, बाकी कामो की तरह वो ये काम भी नही कर पाता।


 सोचा था कहानी में खून ख़राबा व् रोमांच होगा,लेकिन जैसा हम सोचते है वैसा होने लगे तो...

खैर 'जे' बीच- बीच में ये भी कहता रहता है कि वो आदमियों को देखकर उनके इरादे जान लेता है।

फिर भी जे कुछ नही समझ पाता, ये बात मुझे तो बिल्कुल भी हज़म नही हुई।


जेम्स चेस हेडली की तारीफें मैंने बहुत सुनी थी .. लेकिन इस उपन्यास को पढ़कर मैंने एक बात जरुर सीखी -

दूर के ढोल सुहाने होते है .


पता नही ये जेम्स हेडली का असली उपन्यास है भी या नही।

लेकिन अनुवादक  कँवल शर्मा के दावे को सच माने तो ये असली है।

और ये भी हो सकता है कि ये उनका सबसे बेकार उपन्यास हो,क्यूंकि गलतियां सबसे होती है, जैसे मुझसे हुई।

और दोस्तों गलतियों से सीखना चाहिए , इसलिए आप मेरी गलती से भी जरुर कुछ सीखना। ..

आपने एक मुहावरा सुना होगा - नाम बड़े और दर्शन छोटे .- अगर उस मुहावरे पर पूरी किताब पढना चाहते हो तो फिर ये किताब आपके लिए ही है ।

कितना हास्यास्पद है न ?

सेना के सबसे माहिर निशानेबाज(2nd best sniper) से उसका सबकुछ छीन लिया जाता है, 

वो कुछ भी नही कर पता .  हाँ J सावंतो का दिया ५० हज़ार का चेक जरुर फाड़ देता है.

और अंत में ये कहता है कि सावंतो को मरने से जादा दुःख ,उसके ५० हज़ार डॉलर के चेक को फटता हुआ देखकर होगा।


ऐसा हकीकत में हो तो समझ आता है, क्यूंकि असल ज जीवन में बेमतलब की चीजें आदमी अपनी नियति समझकर स्वीकार कर लेता है, लेकिन साहित्य में ये चीज़ बर्दास्त नही होती, और विश्वप्रसिद्घ दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्से का भी कथन है कि ‘ जीने की इच्छा से प्रबल जीतने की इच्छा होती है .” 

और आप मानो या न मानो ये चीज़ फंतासी में जरुर लागू होती है।

एक माहिर प्रशिक्षित पूर्व फौजी, और सेना के दूसरे नंबर के शूटर की कहानी का अंत इतना निराशाजनक हो तो फिर क्या फायदा? और ऐसा भी नही है कि दुनिया मे दुःखान्त उपन्यासों का कोई वजूद नही। लेकिन इस तरह के उपन्यास से वैसी अपेक्षाएं करना वैसा ही है जैसे- मध्यांतर के बाद किसी मारधाड़ वाली सस्पेंस थ्रिलर फिल्म का अचानक से जॉनर बदल कर आर्ट फ़िल्म बन जाना।


मेरी रेटिंग- */5


में इस उपन्यास को १/५ स्टार की रेटिंग दूंगा.

एक स्टार इसलिए, क्यूंकि मैंने इसे पढ़ते हुए सोचा था कि आगे कुछ न कुछ अच्छा होगा। और इसी उम्मीद में उपन्यास भी ख़त्म हो गया.. हालाँकि मेरे हाथ कुछ न आया, लेकिन कँवल शर्मा का अनुवाद और उनकी भाषाशैली अच्छी व रोचक थी।

अगर आपने ये उपन्यास अभी तक न पढ़ा है तो मैं बस इतना कहना चाहूँगा कि

समझदार को इशारा काफी होता है ..


दोस्तों अगर आपने ये किताब पढ़ी है तो आपको कैसी लगी. जरुर बताएं ... आपके सहयोग व सुझावों का स्वागत रहेगा ..

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4 टिप्पणियाँ

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (14-03-2021) को    "योगदान जिनका नहीं, माँगे वही हिसाब" (चर्चा अंक-4005)    पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-    
    --
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
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  2. मेरे लेख को चर्चा में शामिल करने के लिए धन्यवाद 🙏

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