नई हिंदी के लेखकों द्वारा चलाई जा रही मुहिम #NoToFree क्या हैं ?

#NotToFree क्या हैं ?


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image: pixabay 




हिंदी के लेखकों  के लिए आमतौर पर  एक मजाक चलता है  -  आप हिंदी के लेखक है ? लेकिन करते क्या क्या  है?

ये एक भद्दा मजाक है, जो आमतौर पर हिंदी साहित्य के लेखकों को अक्सर झेलना पड़ता है।

मुहिम की शुरुआत व अगुवाई करने वाले  नई हिंदी के  लेखकों में दिव्य प्रकाश दुबे जी के हिसाब से नो टु फ़्री मतलब -

 हिंदी लेखकों के साथ होने वाले उस भद्दे मजाक वाले उस माहोल को बदलने की एक कोशिश है- #noToFree 

ताकि आने वाली पीढ़ी को इस तरह की प्रताड़ना ना झेलनी पड़े, और ये हमारी सबकी जिम्मेदारी है कि भविष्य में उनको एक ऐसा स्वस्थ परिवेश मिले, जिससे वो लेखनकर्म को भी एक जॉब की तरह देखें, और उसी काम से आमदनी भी प्राप्त कर सके।

और ऐसा तभी होगा जब  लेखक साहित्यिक सम्मेलनों  व उत्सवो में मुफ्त में जाने से इंकार कर देगा .

 क्यूंकि अकसर इस प्रकार के सम्मेलनों में लेखकों को बुलाया तो जाता है, लेकिन  उनके आने- जाने का खर्च, रहने की व्यवस्था नही की जाती। और न ही उन लेखको को उनका मानदेय मिलता है।

 जबकि उसी आयोजन में शामिल लाइट वाला ,कैमरे वाले, ऑडियो सिस्टम, सफाई कर्मी से लेकर हर छोटे -बड़े आदमी को उनके कार्य व उनकी सेवाओं का पूरा भुगतान दिया जाता  है।

तो फिर लेखकों के साथ ये अन्याय क्यों?

दुबे जी की बात बिल्कुक सही है। लेखक हो या किसी भी क्षेत्र का कलाकार; किसी के साथ भी इस तरह का अन्याय करना अमानवीय है, असामाजिक है।

  •  हर कलाकार को उसकी  योग्यता के अनुसार उनके कार्य का भुगतान मिलना चाहिए।
  • जब आप बीमार होते है तो . डॉक्टर आपका इलाज करता है उसे आप उसकी फीस देते हो।
  • जब आप बाजार से खरीददारी  करते हो,तो भी आप दुकानदार को भी पैसे देते हो।
  • फिर आप लेखकों से अपेक्षा कैसे कर सकते हो, कि वो आपके मंच पर आये, और अपनी दो -चार कविता सुनाए , जनता तालियां बजाए, और फिर आप उस लेखक को चाय -समोसा खिला कर टाटा  गुड बाय ,साधुवाद बोलकर  विदा कर दिया कर दें।

अबतक ऐसा होता आया है  लेकिन अब इस प्रथा को बदने का समय आ चुका है,  ताकि आनेवाली पीढ़ी लेखन को भी एक  फुलटाइम जॉब की तरह  देखे।


  देखिए - कोई भी चीज़ बिना श्रम के उत्पन्न नही हो सकती ,चाहे आप कविता लिख रहे हो या एक पेंटिंग बना रहे हो,उसमे भी श्रम लगता है।

और किसी भी प्रकार के श्रम से उत्पन्न पदार्थ, वस्तु या विचार का एक निश्चित मूल्य होता है, क्योंकि कला की वो क्रिया अपना असल आकार लेने में समय लेती है। और सर्वविदित है कि समय मूल्यवान है; इसलिए श्रम का भी मूल्य होता है, चाहे वो किसी भी प्रकार का हो, और होना भी चाहिए! क्योंकि मुफ्त में मिलने वाली चीजों की कद्र नही की जाती।

लेकिन बहुत से ऐसे लोग भी हैं जो #not to free  मुहीम का मजाक उड़ाते हुए लिख रहे है कि -

  •  धन का लोभ लेखक को भ्रष्ट कर एक व्यापारी बना देगा।  -ये  तर्क नही कुतर्क है। और पता नही क्यों ऐसा कुतर्क  सिर्फ भारत में ही चलता है ।

 ऐसे कुतर्क देकर इस मुहिम का मजाक उड़ाने वालों की नजर में कला का कोई मूल्य नही। और मेरी नजर में  इस तरह के कुतर्क देने वाले असल मे  साहित्य विरोधी हैं। उन्ही के कारण भारत में लेखक शब्द गरीबी का पर्यायवाची बन चुका है ।


कुछ लोगो के थोड़े अलग तर्क है -

 तुलसीदास, वाल्मीकि, आदि  ने जब पैसों के लिए नही लिखा, सिर्फ साहित्य साधना की . तो आप कौन  क्रांतिकारी  होते है दुनिया की रीत बदलने वाले?

 उन्हें एक बात समझनी चाहिए - आप अभी उस दौर में नही जी रहे , जहाँ साहित्य को समुचित सम्मान मिलता था।राजा का दरबार कलाकारों, विद्वानो आदि लोगो से भरा रहता था।  मंत्रिमंडल के समान ही नवरत्नों से शामिल बुद्धिजीवियों से भी राजकीय कार्यों में सलाह -मशवरे लिए जाते थे। उस जमाने मे भले ही लिखकों को मासिक वेतन न मिलता हो , वो पैसे की मांग न करते हो किंतु  उस  वक़्त  कोई लेख़क गरीबी में नही मरता था। 

राजा -प्रजा  सब जानते थे कि जीवनयापन करने के लिए 'मौखिक प्रशंसा'  के अलावा  'अर्थ' यानि धन की भी आवश्यकता  होती है।और हर कोई अपनी बौद्धिक क्षमता के अनुसार  अपनी तरफ से  साहित्यकारों व विद्वानों की पूरी सहायता करते  थे।

विद्वान् सर्वत्र पूज्यते !

ये श्लोक यूँ ही नही लिखा गया है . 


  मध्यकालीन साहित्यकारों पर शोध करोगे तो पाओगे कि अलबरूनी , आमिर खुसरो , चंदरबरदाई आदि साहित्यकार तो सरकारी दरबार में  मुलाजिम भी थे ।

 प्रेमचंद व् निराला जी के समय  में साहित्यकारों  की दुर्दशा  हुई  ये बात अलग है, क्यूंकि वो दौर अलग था .. लेकिन उस वक़्त  में भी आज के समय  की तरह इस  तरह के  ठग न थे,जो आपका कीमती वक़्त बर्बाद कर खुद का स्वार्थ साधते हुए आपसे कहते - 

मेरे इवेंट में आकर  अपने काव्यवाचन द्वारा हिंदी साहित्य पर उपकार करो-  और मैं तुम्हे बदले में एक शॉल और एक नारियल देकर सम्मानित करूँगा।

सफाई कर्मी से लेकर  चाय - समोसे  सर्व करने वाले छोटे से छोटे  आदमी की दिहाड़ी  के पैसों का पूरा हिसाब होगा उनके पास , लेकिन  उस लेखक/ कवि को देने के लिए बस एक नारियल और एक शॉल? हद है!!

अगर नई हिंदी के लेखक फ्री में काम न करने की मुहिम चला रहे है तो अच्छी बात है। सबको इसका समर्थन करना चाहिए। 

लेकिन  साहित्य के बारे में कुछ भी न जानने वाले भी नॉट टू  फ्री के विरोध में लिख रहे हैं -

तुलसीदास  जी भी लेखन से  कमाने के  बारे में रोचते तो रामचरितमानस  कैसे लिखते ?  

अब इनको कौन समझाएं कि तुलसीदास जी के पास तो खुद बादशाह  हाथ फैलाकर आते थे ।  

एक जनश्रुति है कि तुलसीदास जी से प्रभावित होकर  बादशाह अकबर खुद उनके पास आए, और उन्हें अपना  मनसबदार बनने का न्योता दिया।

लेकिन तुलसीदास ने  तो न्योता ये कहते हुए ठुकरा दिया -  

हम सेवक रघुवीर के  पट्ट धरो दरबार ।

अब तुलसी क्या होएँगे नर के मनसबदार ।


उन्होंने  खुद राजा का न्योता ठुकराया था .. क्योंकि वो संत थे,  उनका गुजारा रामकथा सुनाने से प्राप्त दान- दक्षिणा से चल जाता था।

लेकिन विडंबना ये है की  आज के दौर के अधिकांश  लेखक संत नही है । उसे दुनियादारी भी निभानी है भाई! और ना कि किसी देश का राजा या मंत्री उनके  पास आने वाला है। 

 क्योंकि हर कोई यहाँ महाकाव्य नही रच रहा!

 कुछ साधारण लेखन भी करते है, हैरी पॉटर जैसी फंतासी लिखना चाहते है. तो आप उनसे कैसे उम्मीद कर सकते हो कि पैसे के लिए न लिख कर  बस समाज सेवा के लिए लिखे ।

 समाज सेवा के लिए लिख भी देंगे, तो उस रचना में कितनी मेहनत करेंगे? जब उनको पता होगा कि लेखन से कमाई नही होने वाली। और सर पर आजीविका के लिए   ९ से  ५ बजे वाली नौकरी का बोझ अलग।

इनदिनों एक और विचित्र  तर्क पढ़ा मैंने

 अगर आप प्रेमचंद, निराला आदि की श्रेणी में आना चाहते हो तो पैसे के लिए न लिखें।  अगर पैसे के लिए लिख रहे है, तो आप पल्प फिक्शन वाले लुगदी लेखक की श्रेणी में आते हो।

अब आप  इनकी मानसिकता देखिए।  लोकप्रिय साहित्य /पल्प फिक्शन के लेखकों  जिन्होंने ने केवल लेखन की कमाई से अपनी जिंदगी गुजार दी,उनको  यहां किस दृष्टि से देखा जा रहा है ।

मतलब जो लोकप्रिय है, और जिसने पाठकों का मनोरंजन करते हुए कुछ कमाया है वो खराब। लेकिन वो साहित्यकार महान है जिसने गंभीर लेखन करते हुए गरीबी में ही दम तोड़ दिया।

मैं यहां गंभीर साहित्यकारों को छोटा, या पल्प फिक्शन लिखकों को महान नही बता रहा। दोनों ही महान है। मेरा आशय बस इतना ही है ,कि, समाज को हर प्रकार के लेखकों की जरुरत है .

अगर सब गंभीर कहानियाँ ही लिखने लगे, तो  बाकि के लोग मनोरंजन के लिए क्या करेंगे? फेसबुक पर मीम्स पढ़ेंगे?

और जरूरत से ज्यादा गंभीरता से जीवन नीरस हो जाता है। जीवन मे सभी रसों का समावेश होना चाहिए।

 हर श्रेणी के लेखक को इज़्ज़त मिलनी चाहिए। 

हर तरह के साहित्यकारों को सम्मानित किया जाना चाहिए ताकि वो अपनी कला के माध्यम से अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सके। 

अब बस एक सवाल बाकी रह जाता है -

पैसों के लिए क्यूँ लिखे ?

क्यूंकि आप अपनी कला के माध्यम से अपनी भावनाओ का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना चाहते है ..  और उसके लिए जरुरी है कि आपका ध्यान सिर्फ लेखन पर हो ..

  •  क्यूंकि भोजन बिना भजन संभव नही .. 
  • और अच्छी आय  के बिना उच्च कोटि का चिंतन संभव नही -  

ऐसा मैं नही  Maslow के  मानव जरूरतों के पदानुक्रम का पिरामिड कहता है (maslow hierarchy of needs)

 अगर अन्य देशो में लेखन को एक करियर बनाया जा सकता है तो .. ये सब भारत में भी संभव है .. 

हो सकता है वक़्त बदलने में काफी समय लग जाय .. लेकिन  

  प्रयत्न  करने से ही कार्य  पूरे होते है , केवल इच्छा  से नही !


इसलिए प्रयत्न कीजिये ताकि कम से कम आने वाली पीढ़ी  लेखन में भी करियर तलाश कर सके .. वो   इसे अपनी कमाई का जरिया बना सके .. और कोई ये न पूछे की - 'अच्छा लेखक हो ! लेकिन करते क्या हो ? और सबसे बड़ी बात - लेखन और लेखक दोनों  जिन्दा  रहे ..





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10 टिप्पणियाँ

  1. हर किसी को उसकी उपयोगिता के आधार पर पैसे दिए जाते हैं।

    हिंदी का लेखक क्योंकि कम बिकता है इसलिये वह उतना नहीं कमा पाता कि अपने परिवार का भरण पोषण करने लगे। अगर वह ज्यादा बिकने लगे तो नौकरी करना उसके लिए मजबूरी नहीं रहेगी। वह क्यों नहीं बिकता यह अलग विषय है।

    रही आयोजन के लिए पैसे देने की बात तो पैसे जरूर दिए जाने चाईए। अगर लेखक के आने से टिकट बिकते हैं तो उसे पैसे मिलने ही चाहिए।

    not for free अच्छी मुहिम है इसका विरोध करने का कोई तुक नहीं है बस यह सोचना है कि कौन से लेखक क्या फीस लेगा यह बात उसकी ब्रांड वैल्यू करेगी। और ब्रांड वैल्यू का लेखन की गुणवत्ता से उतना लेना देना नहीं है। आप कितनी भीड़ जुटा पाते हैं उससे है। और यहीं पर काफी लेखक मात खा जाते हैं।

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    1. जी सही बात है। संचालक लेखक के नाम पर पैसे बनाते है तो फिर उन पैसों पर लेखक का हक़ भी है।

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  2. आपने बहुत बढ़िया लेख लिखा है। आजकल पेड पब्लिकेशन्स के जमाने में अवार्ड भी पेड हैं। सब कुछ आपका है, कुछ फोटो खींचकर आपके मुँह में लॉलीपॉप डाल देंगे। सारा खर्चा आपका और आप दांत फाड़कर हँसते है, मुझे अवार्ड मिला।
    कुछ अपवाद हैं। एक ऑनलाइन ई पत्रिका है अनहद कृति जिन्होंने पिछले वर्ष फरवरी के महीने में लेखकों को धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) एक संगोष्ठी में आमंत्रित किया। मैं भी पत्नी संग गया। आने-जाने का खर्च हमारा था। हिमाचल टूरिज्म के होटल काश्मीर हाउस, जो हेरिटेज होटल है, वहाँ 2 दिन हमारे रहने और खाने का खर्च उनका था। वहाँ संगोष्ठी चली, बहुत आनंद आया। सुबह की चाय से लेकर रात के डिनर का खर्च उनका था।

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  3. पूरी तरह से सहमत हूं लेखकों को उनका उचित मूल्य मिलना ही चाहिए और हमें बताना चाहिए कि हम भी अपने काम के लिए पैसे लेंगे और इसमें कोई बुराई नहीं है

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    1. जी बिल्कुल सही कहा। आपने काम के पैसे लेने में कोई बुराई नही है।

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  4. ज्यादा समय नही गुजरा जब एक पाठक ने ही मुझ से ये सवाल किया था कि गर्ग साहब लिखने के अलावा क्या करते हो...मैंने सहजता से जवाब दिया कि मैं सिर्फ लिखतां हूँ... इसके अलावा कोई काम नही करता ...उसने बड़ी हैरानगी से पूछा फिर आपका घर कैसे चलता है....मैंने जवाब दिया कि अपने लेखन से ही अपना घर चलाता हूँ....मेरा ये सब लिखने का उद्देश्य सिर्फ इतना है कि एक आम पाठक भी जानता है कि हिंदी के लेखको की दशा क्या है....हिंदी लेखको के माथे पर गरीबी का तमगा चिपका दिया गया है....ऐसे में अगर हिंदी लेखक फ्री में नही लिखने की मुहिम चला रहे है तो इसमें कुछ गलत नही है....मैं पूर्ण रूप से इस मुहिम के साथ हूँ...में तो उन एप्प के भी खिलाफ हूँ जो लोगों को फ्री में लिखने और फ्री में पढ़ने की अफीम बांटते है।

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    1. जी सही बात है लेखक के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि लेखन के अलावा आप करते क्या है। आशा करते है आने वाली पीढ़ी को ऐसा माहौल मिले कि वो गर्व के साथ कह सकें कि हम बस लिखते है।

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  5. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (21-03-2021) को    "फागुन की सौगात"    (चर्चा अंक- 4012)    पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-    
    --
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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    1. मेरे लेख को अपने मंच पर साँझा करने के लिए आपका बहुत बहुत आभार 🙏

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