साक्षात्कार : शोभा शर्मा जी

 

पारिवारिक, सामाजिक ,सस्पेंस, थ्रिलर ,हॉरर सभी विधाओं की लगभग 135 कहानियाँ , धारावाहिक , परिचर्चाएं ,एवं अनेक लेख . और नव  प्रकाशित चर्चित उपन्यास ' एक थी मल्लिका ' की लेखिका  शोभा शर्मा जी हिन्दी साहित्य मे एक जाना- पहचाना नाम है ।

 साहित्य की विभिन्न विधाओं मे  3 दशको से अधिक समय का लेखन अनुभव होने केअलावा शोभा जी भारतीय आकाशवाणी मे भी काफी सक्रिय रही हैं ।

आज हम रूबरू होने जा रहे है शोभा जी से और जानेंगे उनके जीवन से जुड़े कुछ रोचक तथ्य । 




प्रश्न- शोभा जी सबसे पहले अपने बारे में कुछ बताइये। क्या करते हो आप, कहाँ से हो?

उत्तर -अरविंद जी, सबसे पहले तो मैं आपका धन्यवाद अदा करती हूँ जो अपने ब्लॉग पर बुलाया। मैंने एक बहुत छोटे

से गाँव बल्देवगढ़ में, जहां मेरी अभिभाविका मेरी बड़ी बुआ जी केशर देवी शर्मा जो प्रधानाध्यापिका रहीं, अपना

पूरा बचपन गुजारा। इस तरह मुझे ग्रामीण परिवेश को बहुत बारीकी से जानने का अवसर मिला। ग्यारहवीं

करके फिर कॉलेज की स्नातकोत्तर तक की शिक्षा मेरे जन्मस्थान टीकमगढ़ से हुई। बुआ जी को अपना आदर्श

मानते हुए अध्यापिका बनने के लिए बी.एड. भी किया। मैंने अपने जीवन में पूरा भारतवर्ष लगभग 100 से

अधिक बड़ी जगहें, विदेश प्रवास स्वीडन, एम्स्टर्डम घूमा। जीवन में सभी तरह के अनुभव इन यात्राओं में, और

अलग-अलग जगहों पर रहकर मिले, जिन्हें मैंने कलम बद्ध किया।

प्रश्न- लेखन की शुरुआत कहाँ से हुई। पहली रचना कौन सी थी, लिखने का विचार कैसे आया?

उत्तर --सरकारी नौकरी छोड़नी पड़ी, एक दौर बहुत ही खराब गुजरा, कभी-कभी इंसान कुछ गलत फैसले ले लेता है।

और यह कभी न कभी सभी की ज़िंदगी में होता है। तब मैंने ज़िंदगी से सीखा बहुत कुछ और तब विचार

दिमाग में हलचल मचाए रहते थे। लिख कर मैंने बहुत सारी दिल्ली प्रेस और तमाम पत्रिकाओं के लिए लगभग

70 कहानियाँ लिखीं। तब मैंने नियमित लेखन 1992-2006 तक किया। आकाशवाणी में कंपीयरिंग के साथ, मेरी

कहानियाँ, वार्ताएं, हास्य व्यंग्य, परिचर्चाएं, राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में, आकाशवाणी में आतीं रहीं। 2018 से पुनः

लेखन जारी कई वेब मेगजीन्स मातृ भारती, कहानियाँ, प्रतिलिपि में। पहली कहानी दिल्ली प्रेस से ‘खोटी झांझरें’

छपी थी।

प्रश्न- आपके उपन्यास ‘एक थी मल्लिका’ को पाठकों का भरपूर स्नेह व सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है।

हॉरर लिखने का विचार कैसे आया,और कितना वक्त लगा इस उपन्यास को पूर्ण होने में?




उत्तर --“जी हाँ, ‘एक थी मल्लिका’ को पाठकों का भरपूर स्नेह मिला। अभी भी बिक रही है। हॉरर लिखने का विचार

बस कुछ दिनों से मन में एक प्लाट चल रहा था इसलिए बस उसको कलम बद्ध किया। फिर फ्लाइड्रीम्स

पब्लिकेशन्स से जयंत जी के गाइडेंस से वह उपन्यास के रूप में छप कर सामने आया। इसे लिखने और दो

एडिशन्स को सामने आने में लगभग एक डेढ़ वर्ष लगा।

प्रश्न- किन विषयों पर लिखना आपको अधिक पसंद है। और किन विधाओं में लिख रही है आप? आगामी

प्रोजेक्ट्स क्या है?

उत्तर --मैं सभी विधाओं में लिखती हूँ। सामाजिक विधा में मेरी कहानियाँ ज्यादा हैं पर हॉरर में मैंने बहुत सारे

पुरस्कार पाये। दिल्ली प्रेस, गृहलक्ष्मी, मनोरमा, मेरी सहेली ने भी मुझे पुरस्कार दिया। इसी तरह कविता में भी

अनेक पुरस्कार मिले। अनेक परिचर्चाएं भी आयोजित करके कई लेखकों के साथ, अपने विचार सामाजिक मुद्दों

पर छपे।

आगामी प्रोजेक्ट्स, कुछ उपन्यास, कहानी संग्रह, कहानियाँ लेखन हैं जो अभी चल रहे हैं। जल्द ही पाठकों के

समक्ष आएंगे।


प्रश्न-लेखन के अलावा पाठन की बात करें तो किस प्रकार की किताबें पढ़ने का शौक रखती है आप? पसंदीदा

लेखक कौन है?

उत्तर -मैं हर तरह की किताबें, सभी विधाओं में, साहित्यिक पत्रिकाएँ ज्यादा, अखबार, उपन्यास, कहानी संग्रह जो मिल

जाए, पढ़ना पसंद करती हूँ। लेखन के साथ पाठन भी एक लेखक के लिए जरूरी है। जैसे कोई यह नहीं कह

सकता कि मैं क्या खाता हूँ!! ऐसे ही यह मानसिक भोजन है और पढ़े बिना रहा नहीं जा सकता।

प्रश्न- लेखन व पाठन के अलावा और किन चीजों में रुचि रखते हो आप?

उत्तर --पढ़ने के अलावा मेरी और भी हावीज़, वागवानी, पेंटिंग, हारमोनियम, सिलाई कढ़ाई, कुकिंग, ट्रेवलिंग,

घुमक्कड़ी हैं।

प्रश्न- इन दिनों हिंदी के युवा लेखकों द्वारा एक #notofree मुहिम चलाई जा रही है। जिसमें वे लेखकों से

अपील कर रहे है कि लेखकों को मुफ्त में साहित्यिक सम्मेलनों में शामिल नहीं होना चाहिए। इस बारे में आपके

क्या विचार हैं?

उत्तर -यह मुहिम सही चलाई जा रही है। पहले भी साहित्यिक सम्मेलनों जब लेखकों को बुलाया जाता था तो आने

जाने का ट्रेन का एसी का किराया, ठहरने, भोजन वगैरह का इंतजाम आयोजकों की तरफ से होता था । यही

गोष्ठियों में होता था। जो गोष्ठी आयोजित करता था तो जलपान के साथ नई प्रकाशित किताबें भी अपनी

बांटते थे।

जब सभी कार्यों को करने के लिए एक तयशुदा पेमेंट मिलता है तो लेखकों का लेखन फ्री में नहीं जाना चाहिए।

आखिर हमारे लेखन के कार्य में बहुत अधिक मानसिक एनर्जी लगती है इसके अलावा समय और आजकल

डाटा, लेपटॉप, मोबाइल जैसे डिजिटल प्लेटफार्म के लिए उपकरण भी खर्च होते है। लेखकों को भी अपना परिवार

पालना होता है और परिवार को जवाब देना पड़ता है कि हम मुफ्त में क्यों यह कार्य कर रहे हैं!! इसलिए

पारिश्रमिक तो लेखकों को मिलना ही चाहिए।

प्रश्न- डिजिटल क्रांति के इस दौर में पाइरेसी लेखकों व प्रकाशकों के लिए एक गहरा नासूर बनता जा रहा है।

आपके विचार से क्या इस गंभीर बीमारी का इलाज संभव है?

उत्तर -पाइरेसी वाकई एक बड़ी बीमारी है डिजिटल टाइम में परंतु इसके लिए साइबर सेल है जो चाहे तो बड़े पैमाने पर

कार्य करके इसे रोक सकता है। आखिर विदेशों में इतने सख्त कानून हैं, फिर हमारे यहाँ यह क्यों नहीं हैं!! भले

नवयुग तैयार हो रहा है। पर स्ट्रिक्टनेस होनी चाहिए। यदि ईमानदारी और मेहनत से चोरी रोकने के लिए

नियम कानून का पालन किया जाए, कार्य किया जाए तो निश्चित ही पाइरेसी रुकेगी। क्या हम सोचते थे कभी

कि इस तरह से पूरा साहित्य डिजिटल प्लेटफार्म पर आ जाएगा!! नहीं न!! जिस तरह पाइरेसी करने के लिए

तरीके कुछ लोगों ने निकले हैं उसी तरह इसे रोकने के तरीके भी हमें ही ईजाद करने होंगे।


प्रश्न- अंत में अपने पाठकों व नए लेखकों को क्या संदेश देना चाहेंगे आप?

उत्तर -लेखन बहुत मेहनत का काम है। इसमें पूरा कंसनट्रेशन लगता है। तन, मन, धन सभी जाया होते हैं और

परिणाम देर से आते हैं इसलिए धैर्यपूर्वक लेखन करते रहें। भाषा शुद्ध हो। अपने समीक्षक स्वयं बने, क्या

गलतियाँ हो रहीं हैं, सुधार कार्य करते रहे। जब आप पढेंगे दूसरों को, तब खुद ही समझ जाएंगे।


जो प्लाट दिमाग में आए उसे एक नोट पेड़/ डायरी में नोट करने की आदत विकसित करें। डायरी लिखने की

आदत अच्छी है। अधूरा लेखन न छोड़ें, वरना वह पड़ा ही रह जाएगा। उसे पूरा करके नया शुरू करें। कई ड्राफ्ट

बनाएँ सुधारते हुए। पहले ड्राफ्ट पर ही न खुश होने लग जाइए। हाँ, त्वरित लेखन भी कीजिये, किसी विशेष

विषय पर, आपकी लेखन क्षमता बढ़ेगी और रोज लिखिए। या सप्ताह में लेखन के दिन घंटे तय कीजिये।

धन्यवाद ।



गल्पज्ञान डॉट कॉम को साक्षात्कार हेतु अपना अमूल्य समय देने के लिए आपका बेहद  शुक्रिया शोभा जी।

आशा करते हैं आप आगे भी अपनी लेखनी से हिन्दी साहित्य की शोभा यूं ही बढ़ाते रहोगे । 


शोभा जी का उपन्यास 'एक थी मल्लिका'' आप इस लिंक से ऑर्डर कर सकते हो ।

एक थी मल्लिका''

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6 टिप्पणियाँ

  1. वैसे तो मैं शोभा मैम के बारे में बहुत कुछ जानती हूँ , पर फिर भी आज और भी गहराई से जाना उनकी रचनाओं और उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में जानकर काफी अच्छा लगा।
    अरविंद जी को भी बहुत-बहुत धन्यवाद जो सभी लेखकों को हमें नजदीक से समझने का मौका देते हैं

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  2. आज इस साक्षात्कार के माध्यम से आपको और भी करीब से जानने को मिला।बहुत ही रोचक साक्षात्कार 👌👌👌👌👌👌👌

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  3. रोचक बातचीत रही। शोभा जी ने आने वाले उपन्यासों का इंतजार रहेगा।

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